Srishti Khanda Extracted Page 827
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-827
Sanskrit Original
येषां पुत्रैश्च पौत्रैश्च पुरोगैः सचिवैस्तथा । निपातिताश्च दैतेयाः शरशक्त्यृष्टिवृष्टिभि: ॥२२॥ ग्रहैश्च श्वसनैरेव क्षयगंधर्वकिन्नरैः। महत्या गदया चैव कुबेरेण च धीमता ॥२३॥ घनानां निकरैर्वज्रैस्तुषारैर्विधुनेरितैः। पन्नगानांविषैर्घोरै दैत्याः पेतुर्घरातले ॥२४॥ अन्यैश्च विविधैदेवैः कोटिकोटिसहस्रशः। पातिताः प्रययुस्सर्वे धरण्यां तु गतासवः ॥२५॥ देहांस्त्यक्त्वा दिवं यांति केचिच्च यम मंदिरम्। केचित्रच्छंति पातालं पुण्यापुण्यप्रयोगतः ॥२६॥ एतस्मिन्नंतरे वेदाञ्जजल्पुः परमर्षयः। स्वस्त्यस्तु ब्राह्मणेभ्यश्च गोभ्यः स्त्री भ्यस्तपस्विषु ॥२७॥ प्रयुध्यमानेष्वन्येषु सांप्रतं सर्वजंतुषु । विबुधैरदिता दैत्याः शेषाः पर्वतमाञ्रिताः ॥२८॥ प्रजग्मुश्च दिशः सर्वाः कातरा रणभीरवः । दैत्यव्यूहे प्रभग्ने च बलो नाममहाबलः ॥२९॥ अर्दयामास देवांश्च संयम्याग्रिसमैः शरैः । तस्य बाणार्दिता देवा बहवो बलदर्पिताः ॥३०॥ पतिता धरणीपृष्ठे केचिद्धग्रा रणाजिरे । दृष्ट्वा तस्य महत्कर्म दारुणं लोकभीषणम् ॥३१॥ शशंसुऋषयो देवास्तत्र शिष्टाः प्रचुक्कुशुः । अथ क्रुद्धो महातेजाश्शतक्रतुररिंदमः ॥३२॥ जघानशरसंदोहैर्बलं बलवतांवरम् । सोपि क्कुद्धो बलो युद्धे तथा शक्रं ससंभ्रमः ॥३३॥ रुधिरेणावसिक्तांगौ प्रसृतेन महाबलौ । तौ यथामाधवे मासि पुष्पितौ किंशुकद्वुमौ॥३४॥ चक्राणि च सहस्राणि शूलानि मुसलानि च । निचखान रणे शक्रे चपले चासुरोत्तमः॥३५॥ तानि चक्राणि शूलानि निचकर्त्तशरोत्तमैः । सुरराट् सहसा भ्रांतो लीलया समरे बली ॥३६॥ स च दैत्यो महातेजाः शक्त्या चैव पुरंदरम्। निजघान तदातूर्णं गजस्थं च स्तनांतरे ॥३७॥ नामक अग्नि की ज्वाला वाले बाणों से और वरुण ने अपने पाश से बाँधकर दैत्यों को यमलोक भेज दिया ॥२१॥ जिन सबों के पुत्रों, पौत्रों, पुरोहितों तथा मन्त्रयों के द्वारा बाणों से शक्ति से तथा ऋष्टियों के द्वारा दैत्य मार दिये गये।। २२॥ ग्रहों, वायुओं, यक्षों, गन्धर्वो, किन्नरों के द्वारा बुद्धिमान कुबेर ने अपनी विशाल गदा से, मेघ समूह के द्वारा, वज्रों के द्वारा, चन्द्रमा के द्वारा प्रयुक्त शीत के द्वारा, सर्पो के भयङ्कर विष के द्वारा, वे दैत्य पृथिवी पर गिर पड़े ॥२४॥ दूसरे भी अनेक प्रकार के करोड़ों देवों द्वारा पृथिवी पर गिराये जाने से दैत्य मर गये ॥२५॥ उनमें से कुछ अपने शरीर का त्याग करके स्वर्ग जाते थे तथा कुछ यमलोक जाते थे । कुछ दैत्य अपने पुण्य तथा पाप के प्रयोग के कारण पाताल में चले जाते थे ।।२६।। उसी समय परमर्षियों ने वेदों का पाठ किया और कहा ब्राह्मणों, गौओं, स्त्रियों तथा तपस्वियों का कल्याण हो ॥२७॥ युद्ध करने वाले दूसरे सभी जीवों का कल्याण हो । देवताओं के द्वारा पीडित होकर सभी दैत्य पर्वतों में भग गये ॥२८॥ कायर और रणभीरु दैत्य विभिन्न दिशाओं में भग गये दैत्यों की सेना के पलायन कर जाने पर महाबलवान् बल ने अग्नि के समान बाणों का सन्धान करके देवताओं का मर्दन किया । उसके बाणों से मर्दित बल के दर्प से दृप्त अनेक देवता ॥३०॥ पृथिवी पर गिर पड़े और कुछ रणभूमि में ही गिर पड़े । उसके भयङ्कर कठोर तथा महान कर्म को देखकर ॥३१॥ ऋषियों ने उसकी प्रशंसा की और वहाँ पर बचे हुए देवता चिल्लाने लगे । उसके पश्चात् शत्रुओं का मर्दन करने वाले इन्द्र क्रुद्ध होकर ॥३२॥ अपने बाणों से बलवानों में श्रेष्ठ बल नामक दैत्य को मारा । उसके बाद क्रुद्ध होकर बल ने भी इन्द्र पर प्रहार किया। उसके कारण प्रवाहित होने वाले खून से दोनों (इन्द्र और बल) भिंग गये । वे दोनों चैत्र के महीनें में सुशोभित होने वाले पलाश वृक्षों के समान लाल-लाल लग रहे थे ॥३३-३४॥ असुरोत्तम बल ने इन्द्र पर हजारों चक्रों से, शूलों से और मुसलों से प्रहार किया ॥३५॥ बलवान् देवराज इन्द्र ने भी बड़ी आसानी से उन चक्रों तथा शूलों को अपने बाणों द्वारा तोड़ दिया ॥३६॥ उसके बाद महातेजस्वी बल ने हाथी पर बैठे हुए इन्द्र की छाती में शक्ति से प्रहार किया ॥३७॥ उस प्रहार से मारे गये इन्द्र हाथी पर ही मूर्छित हो गये । उसके बाद होश में आकर इन्द्र ने बल
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