Srishti Khanda Extracted Page 826

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-826

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Sanskrit Original

सर्वे योद्धं गतास्ते च हृष्टा रणसमुत्सुका: | एतस्मिन्नंतरे युद्धं देवदानवयोरपि ॥६॥ नभूतं नश्रुतं पूर्व सर्वलोकभयंकरम् । शस्त्रास्त्रेर्बहुधा युक्तं शिशिरेणेव काननम् ॥७॥ धरां स्वगौक आकाशं संरुध्य युद्धमाबभौ । अन्योन्यं जधघ्नुराकाशे तथान्योन्यं महीतले ॥८॥ शक्तिभिर्मुसलैर्भल्लैर्बहुभिः शरवृष्टिभिः । दारुणैः खड्गपातैश्च तथा चक्रपरश्चधैः॥९॥ अन्यायुधैश्च विविधैर्निर्जघ्नुस्ते परस्परम् । अभवन् घोररूपाणि धराकाशेऽ व्ययानि च ॥१०॥ शस्त्रे: शरैरसृक्यातैः कंकवायसजंबुकैः । यथा मुसलधाराभिर्घना वर्षति लोहितम् ॥१९॥ तथैव क्षतजैः स्रस्तैः स्वाङ्गाच्च देवदानवाः । केचित्पतंति मुह्यति स्खलंति च हसंति च ॥१२॥ मुञ्जंति चार्तनादांश्च सिंहनादं मुहुर्मुहुः। केषांचिद्वाहवश्छिन्ना शिछन्नपादास्तथापरे॥९३॥ छिन्नपाश्वोदरा: केचिन्निपेतुः शतशो भुवि । कोटिकोटिसहस्राणि गजवाज्यसुराणि च॥१४॥ अपतन्धरणीपृष्ठे रक्तौघे बहुधा भुवि । ततस्तु धरणीपृष्टे त्वभवल्लोहितार्णवः ॥१५॥ विपरीतास्ततो नद्यःसद्यस्तत्र विसुस्रुवुः। तृणकाष्ठपरास्तत्र शक्तयोदारुसंचयाः ॥१६॥ मुद्रा मुसलाः शूला मकराद्या भवंति च । जयंतिका ध्वजामीनाः कमठाश्चर्मकायकाः ॥१७॥ शरादिभिर्महोष्ट्रैश्च निरुद्धाः प्रचुरैस्तथा। केशचामरशैवालाः संपूर्णास्तास्ततः स्ततः ॥१८॥ पतद्भिश्च तथान्यैश्च विविधैः क्षतजार्णवः । तदा वसुंधरा सर्वा सशैलवनकानना ॥१९॥ रुधिरौघा महाघोरा सर्वलोकभयंकरा । स्कंदस्य शक्तिपतेन गता दैत्या यमक्षयम् ॥२०॥ पर्शुना परमेणैव अग्निनाग्निशिखैः शरैः । वरुणस्य च पाशेन वद्धामप्रायमक्षये ॥२१॥ सभी वसुगण, स्कन्दजी, गणेशजी इत्यादि भगवान् विष्णु को आगे करके ॥५॥ युद्ध करने के लिए उत्सुक होकर प्रसन्नता पूर्वक चले । इस समय देवताओं और दानवों का अभूतपूर्व तथा आश्रुत पूर्व सम्पूर्ण लोकों के लिए भयङ्कर युद्ध हुआ । जिसतरह वर्फ से वन ढँक जाता है उसीतरह शस्रासतरों से पृथिवी, आकाश भर गया वीर आकाश में एक दूसरे पर प्रहार कर रहे थे और पृथिवी पर भी एक दूसरे को मार रहे थे ॥६-८॥ वे परस्पर में एक दूसरे को भयङ्कर खड्ग प्रहार से, चक्र एवं फरसे से, शक्ति, मुसल तथा बहुत अधिक भल्ल बाणों की वृष्टि से प्रहार कर रहे थे ॥९॥ वे दूसरे आयुधों से भी दूसरों को मार रहे थे । शस्त्रो से बाणो से, रक्तपात से कंक पक्षियों, कौओं से और शृगालों से पृथिवी तथा अनन्ताकाश भयङ्कर दिखने लगे । लग रहा था जैसे मेघ मुसलाधार खून की वर्षा कर रहे हों॥ १०-११॥ उसीतरह आङ्गों से निकले हुए खून के कारण अपने अङ्गो के गिर जाने से कुछ देवता और दानव गिर रहे थे, बेहोश हो रहे थे फिर हँसने लगते थे ॥१५२॥ वे बार-बार आर्तनाद तथा सिंहनाद कर रहे थे । किसी की भुजा कट गयी थी तो किसी के पैर कट गये थे ॥१३॥ सैकड़ों वीर पार्श्व तथा उदर के विदीर्ण हो जाने से करोड़ों- करोड हजार हाथी घोड़े तथा असुर पृथिवी पर गिर पड़े ॥१४॥ ये सबके सब पृथिवी पर गिर पड़े और पृथिवी पर रक्त समूह का मानो रक्त सागर बन गया ॥१५॥ उस समय शीघ्र ही नदियाँ विपरीत दिशा में बहने लगीं । तूण और काष्ठ स्वरूप वहाँ शक्तियाँ मुद्रर, मूसल, त्रिशूल आदि उस सागर के मानो घडियाल आदि थे । विजयध्वज ही उस रक्त सागर की मछलियाँ थी और ढाल इत्यादि उसके कच्छप थे ॥१६-१७।। अत्यधिक बाण तथा बड़े-बड़े ऊंट उस सागर के तट बन्ध बन गये । केश तथा चामर ही उसके सेवार थे । इसतरह वे चारो ओर भरे पड़े थे ॥१८॥ गिरने वाले तथा दूसरे अनेक प्रकार के खूनों से पर्वत तथा वनों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी रुधिर समूह से अत्यन्त घोर और सभी लोकों के लिए भयङ्कर हो गयी । स्कन्द के शत्तिप्रहार से दैत्य यमलोक पहुँच गये ॥२०॥ अग्न ने पर्शु १०१

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