Srishti Khanda Extracted Page 825
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-825
Sanskrit Original
प्रभप्ने ते गदे खस्थौ खड्गचर्मधरावुभौ । तदापदातिनोर्युद्धमद्धुतं लोमहर्षणम् ॥१५॥ दृष्ट्वा च विस्मयं जम्मुर्देवासुरमहोरगाः । खड्गपातैर्मुहूतन्ति तयोश्रिछन्ने तु वर्मणी ॥१६॥ अभवत्खड्गयुद्धं च तयोर्युद्धाति शीलिनोः । दधार चिकुरे तस्य जयंतो भीमविक्रमः ॥१७॥ शिरश््ित्वास्य खड्गेन पातयामास भूतले। ततस्तु जयशब्देन देवाः सर्वे ननंदिरे॥१८॥ प्रभग्ना दैत्यसंघाश्च दिशः सर्वाः प्रदुद्रुवुः ॥१९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे कालेयवधोनाम षट्षष्ठितमोऽध्याय ॥६६॥ —— ie सड़सठवाँ अध्याय व्यास उवाच एतच्छुत्वा तु दैतयेंद्रो हिरण्याक्षो महाबलः । सरोषश्चातिताम्राक्षो ह्यासुरानादिदेश ह ॥९॥ स्वयं गच्छामि युद्धाय देवानां विजिघांसया। नागच्छति न युद्धयंते तेन मार्गाद्विशन्त्वितः ॥२॥ एतच्छुत्वा तु वचनं शेषा दैत्यगणाधिपाः। युद्धाय प्रययुः सर्वे शूलपाशातिपंडिताः ॥३॥ अधिकं पूर्वसैन्याश्च तथाशतगुणैरपि । निरंतरं तथाकाशं प्रययुर्युद्धकांक्षिणः ॥४॥ ततो रूद्रास्ससाध्याश्च विश्वे च वसवस्तथा । स्कंदश्च गणपश्चैव विष्णुजिष्णुपुरोगमाः ॥५॥ से बार-बार शब्द होता था इसतरह उन दोनों का गदा युद्ध चार वर्ष तक चला ॥१५४॥ उन दोनों की गदायें टूट गयीं तो आकाश में ही स्थित रहकर उन दोनों ने खड्ग और ढाल धारण कर लिया उस समय उन दोनों का अद्भुत और लोमहर्षक युद्ध हुआ ॥१५॥ उसको देखकर असुर, देवता और महोरग आश्चर्यित हो गये । खड्ग के प्रहार से दोनों के कवच टूट गये ॥१६॥ उन दोनों का खड्ग युद्ध चलता रहा । उसके बाद महापराक्रमी जयन्त ने उसके बालों को पकड़ लिया । उसने खड्ग के प्रहार से उसके शिर को काटकर पृथिवी पर गिरा दिया । उसके बाद जय-जयकार करते हुए सभी देवता आनन्दित हो गये ॥१७-१८॥ और सम्पूर्ण दैत्यसेना प्रभग्न होकर विभिन्न दिशाओं में भाग गयी ॥१९॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के कालेय वध नामक छियासठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।६६।। —— इन्द्र के द्वारा बल और नमुचि का वध व्यासजी ने कहा-- इस बात को सुनकर महाबलवान् हिरण्याक्ष नामक दैत्यराज ने क्रोध से अपनी आँखे लाल कर ली और उसने आदेश दिया ॥१॥ मैं स्वयं देवताओं को मार डालने की इच्छा से युद्ध करने जा रहा हूँ! क्योंकि जाने वाले न आते हैं और युद्ध करते हैं । अतएव वे मार्ग से हट जायँ ।।२॥ इसबात को सुनकर बचे हुए दैत्यगणों के स्वामी जो शूल तथा पाश में अत्यन्त निपुण थे वे युद्ध करने के लिए चल पड़े ॥३॥ पहले की सेना से सौ गुना अधिक वे आकाश को भरकर युद्ध करने की इच्छा वाले चल पड़े ॥४॥ उस समय सभी रुद्र, साध्यगण
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