Srishti Khanda Extracted Page 824
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-824
Sanskrit Original
\ सृष्टिखण्ड ७९९ छियासठवाँ अध्याय व्यास उवाच भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा कालेयो नाम दानव: | चित्ररथं प्रदुद्राव धृत्वा बाणं सकार्मुकम् ॥९॥ दृष्ट्वासुरं विधावंतं कालमृत्युसमप्रभम् । अरौत्सीत्तं महावीर्यो जयंतः पाकशासनिः ॥२॥ अब्रवीच्च महातेजा दैतेयं सुरसत्तमः। तथ्यं धर्माभिसंयुक्तं लोकद्वयहितं ध्रुवम् ॥३॥ शसतराभिधातदुः खार्त कश्मलं चान्यसंयुतम् । प्रभग्नंच निरस्तंच यो हंति स च वालिशः ॥४॥ सुचिरं रौरवं भुक्तवा तस्य दासो भवेच्चिरम्। तस्मान्माऽमुं प्रयुध्यस्व युद्धधर्मस्थितो भव॥५॥ जयंतमब्रवीद्वाक्यं कालेयः क्रोधमूर्च्छितः । निहत्यभ्रातृहंतारमथ त्वां हन्मि सांप्रतम् ॥६॥ ततस्तंचासुर श्रेष्ठं कालानलसमप्रभम् । जयंतो निशितैर्बाणै र्जघान सुरसत्तमः ॥७॥ निचकर्त शरान्सोपि त्रिभिर्विव्याध चासुरः । यथा वृष्टिगणं प्राप्य नदी गैरिकवाहिनी ॥८॥ तथा तौ च महावीर्यौ न क्षीणौ न च कातरौ। न शर्मपरिलेभाते परस्परजयेषिणौ ॥९॥ अथ तस्य च दैत्यस्य धनुश्चिच्छेद चेषुणा। यंतारं पंचभिर्बाणैः पातयामास भूतले ॥१०॥ अष्टाभिर्निशितैर्बाणै श्रतुरोश्वानपातयात् । शक्तिं संगृह्य भूमिष्ठः कुमारं च जघान ह ॥११॥ गदया पीडितं साश्वं सवरूथं सकूबरम् । पातयित्वा धरण्यां च सिंहनादं ननाद ह॥९२॥ लाघवात्स धरां गत्वा गदापाणिरुपस्थितः। वञ्रपाताद्य॒था शब्दो लोकानां दुःसहो भवेत् ॥९३॥ तथा तयोर्गदापाते शब्दः स्यात्तु मुहुर्मुहुः । एवं तयोर्गदायुद्धं यावदब्दचतुष्टयम् ॥९४॥ जयन्त के द्वारा कालेय का वध व्यासजी ने कहा-- अपने भाई को मरा हुआ देखकर कालेय नामक दानव धनुष बाण धारण करके चित्ररथ के प्रति दौड़ा ॥१॥ काल तथा मृत्यु के समान कान्ति वाले असुर को दौड़ते हुए देखकर उसको इन्द्र के पुत्र महापराक्रमी जयन्त ने रोका ॥२॥ उस दैत्य से देव श्रेष्ठ जयन्त ने धर्मानुकूल दोनों लोकों में हितकारी तथ्य को कहा।।३।। शख्रों के प्रहार से पीडित तथा मूर्छित, युद्ध पराङ्मुख तथा निरस्त को जो मारता है वह मूर्ख है ॥४॥ वह दीर्घकाल तक रौरव नरक की यातना भोगकर दीर्घकाल तक उसका दास बना रहता है । अतएव इसके साथ युद्ध न करो । धर्मयुद्ध करो ॥५॥ क्रोध से व्याकुल कालेय ने जयन्त से कहा-- पहले अपने भाई को मारने वाले को मारकर मैं तुम्हें मारता हूँ ॥६। उसके बाद उस असुर श्रेष्ठ को जयन्त ने कालाग्नि के समान कान्ति वाले तीक्ष्ण बाणों से मारा ॥७॥ उसने भी उन बाणों को काट गिराया और तीन बाणों से जयन्त पर प्रहार किया । जिसतरह वर्षा होने पर गौरिक नदी का जल बहने लगता है, उसीतरह वे दोनो वीर न तो क्षीण हुए और न कातर हुए । परस्पर में एक दूसरे को जीत लेने की इच्छा से शान्त नहीं थे ॥९॥ उसके बाद उस दैत्य के धनुष को जयन्त ने बाण से काट दिया । और पाँच बाणों के प्रहार से सारथि को भी पृथिवी पर गिरा दिया ॥१०॥ आठ तीक्ष्या बाणों से जयन्त ने चार घोड़ों को भी गिरा दिया । इसके बाद पृथिवी पर विद्यमान वह शक्ति लेकर उसका प्रहार कुमार पर किया । गदा के प्रहार से पीडित घोड़ा, वरुथ तथा कूबर के साथ जयन्त के रथ को पृथिवी पर गिराकर कालेय ने सिंह के समान गर्जना किया ॥११-१२॥ शीघ्रता से पृथिवी पर जाकर वह हाथ में गदा लेकर युद्ध के लिए तैयार हो गया। जिसतरह वज्रपात से होने वाला शब्द लोगों के लिए दुःसह होता है ॥१३॥ उसीतरह उन दोनों के गदापात
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