Srishti Khanda Extracted Page 823
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-823
Sanskrit Original
जघानप्रचुरान्दैत्यांस्तांश्रकर्त स॒ लाघवात् । ततोन्योन्यं शरैस्तीक्ष्णैः कालानलसमप्रभै: ॥११४॥ युद्धे धनुष्मतां श्रेष्ठश्चिच्छेद भुवि वेगतः । तद्युद्धमभवद्देवदैत्ययोर्थर्मतो भृशम् ॥१९५॥ ् रष्टुकामागताः पार्श्चमृषिदेवाः सुरोरगाः। एवं शतसहस्राणि बाणानां विधृतानि च॥११६॥ अन्योन्यं समरे वीरौ विजयाय विरेजतुः । अथ क्कुद्धो महातेजा गंधर्वाणां पतिस्तदा ॥११७॥ त्रिभि बिभेदबाणैश्च ललाटे हृदि पंचभिः। सप्तभिर्जठरे नाभौ वस्तौ तस्य सपंचभिः ॥११८॥ शरैः संपातितो दैत्यो मुग्धः कश्मलतां गतः । शिथिलीकृतचापश्च लेभे संज्ञां चिराद्दली ॥११९॥ मधुसंज्ञंत्रिभिर्बाणै स्सबिभेद सुरोत्तमम् । चकर्त्त धनुरखैश्व दैत्यराजस्य पश्यतः ॥१२०॥ ततोबाणसहस्रैस्तु कालांतकसमप्रभैः । बिभेददैत्यसिहं तु सुराणामुत्तमो बली ॥१२१॥ हतचेताः सवैत्येद्रो बहुशोणितसंस्रवः । विह्वलोबहुबाणार्तः शूलं जग्राह दानवः॥९२२॥ शूलहस्तस्य तस्यैव चतुर्भिस्तुरगान्शरैः । हत्वा चपातयामास त्रिभिर्यंतारमेव च॥१२३॥ जघानशूलमुर्वीष्ठस्ततो गंधर्वसत्तमम् । विचकर्त त्रिभिर्बाणैः शूलं चित्ररथो बली ॥१२४॥ शूलं च नष्टकं दृष्ट्वा हतभोगमिवोरगम् । गृहीत्वा मुद्ररं घोरं प्रदुद्राव सुरं बली॥१२५॥ समुद्रं समायन्तं दैत्यसेनाधिपं तदा । विचकर्त्तशिरो देहादर्धचंद्रेण संभ्रमात् ॥१२६॥ स पपातमहीपृष्ठे संचचाल वसुंधरा। ततो दैत्यगणाः सर्वे विमुखा विप्रदुद्रुवुः ॥९२७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे कालकेयवधो नाम पंचषष्ठितमोऽध्यायः ॥६५॥ te दैत्यों को मार दिया और उन बाणों को कालकेय ने शीघ्रता से काट दिया । उसके बाद परस्पर में एक दूसरे को कालाग्नि के समान कान्ति वाले वाणों से ॥११४॥ धनुधारियों में श्रेष्ठ दोनो वीर दोनों को बाणा से छेद दिए । वह युद्ध दैत्य और देवता के बीच धर्म पूर्वक हो रहा था ॥११५॥ उस युद्ध को देखने की इच्छा से वहाँ सन्निकट में ऋषिगण, देवता और सर्पगण आ गये, इसतरह से एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिए दोनों वीरों ने हजारोंबाणों को वर्दास्त किया । उसके बाद महातेजस्वी गन्धर्वपति ने कालकेय के ललाट में तीन बाण और हदय को पाँच बाणों से छेद दिया । पेट में सात बाणों से तथा नाभि तथा वस्ति प्रदेश में पाँच बाणों का प्रहार किया ॥११८॥ बाणों के प्रहार से गिरकर कालकेय बेहोश हो गया । उसका धनुष शिथिल हो गया था और बहुत देर के बाद वहबलवान् होश में आया ॥११९॥ उसने तीन बाणों से मधु नामक देवता को छेद दिया दैत्यराज के समक्ष ही उसो अखों से धनुष को काट दिया ॥१२०॥ उसके पश्चात् काल के समान कान्तिमान बाणों से उसे श्रेष्ठ दैत्य को उत्तम तथा बलवान् देवता ने हजारों बाणों से छेद दिया ॥१२१॥ अनेक बाणों के प्रहार स आर्त बने हुए तथा बहुत अधिक रक्त निकल जाने के कारण संज्ाहीन हो गया उसके पश्चात् उसने अपने हाथ में त्रिशूल उठाया ॥१२२॥ शूल धारण किए हुए उसके घोड़ों को चार बाणों से मारकर तीन बाणों से सारथि को मारकर चित्ररथ ने गिरा दिया ॥१२३॥ पृथिवी पर खड़ा होकर दैत्येन्द्र ने गन्धर्व राज चित्ररथ को शूल से मारा और चित्ररथ ने तीन बाणों से उसके शूल को काट दिया ॥१२४॥ उसके पश्चात् अपने शूल को नष्ट हुए देखकर जिसका फण झुक गया हो ऐसे सर्प के समान भयङ्कर गदा लेकर कालकेय चित्ररथ की ओर दौड़ा । उस समय मुद्रर लेकर आते हुए सेनापति कालकेय को देखकर चित्ररथ ने वेगपूर्वक अपने अर्धचन्द्र वाणों से उसके शिर को काट दिया ॥१२५- १२६॥ वह पृथिवी पर गिर पड़ा और पृथिवी काँप गयी । उसके बाद सभी दैत्य युद्ध पराङ्मुख होकर भाग चले ॥१२७॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के कालकेयवध नामक पैंसठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६५।। क म
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