Srishti Khanda Extracted Page 820

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-820

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Sanskrit Original

पश्य विप्र क्षणेनांतं प्राप्त हरिहरादिकम्। एवमुक्त्वा स देत्येंद्रो बलाध्यक्षुवाच ह॥६९॥ दैत्यराज उवाच सज्जीकृत्य बलं सर्वान् रथांश्चानयत द्रुतम् । व्यास उवाच दैत्यराजवचः श्रुत्वा बलाध्यक्षः समंततः ॥७०॥ बलान्याहूय सहसा संत्रस्तास्तूर्णमागताः । कोटिकोटिसहस्त्राणि अक्षौहिण्यो बलानि च ॥७१॥ एकैकस्य च वीरस्य वाहनानि महांति च । स्यंदनानि विचित्राणि गजोष्टाश्खरानपि ॥७२॥ सिंहव्याघ्रलुलायांश्च समारुह्य ययुस्तदा । वाद्ये: सर्वैश्चभूयिष्ठैः सिंहनादैर्भयानकैः ॥७३॥ दिशस्तु पूरयामासुसिन्धुवेलाचला धराः । सर्वलोकाश्च वित्रेसुः समुद्राश्च चकंपिरे ॥७४॥ देवदुंदुभयो नेदुः सर्वदेवैः समीरिताः। वाद्यैश्च विविधैरन्यै ् वायुपूरणैर्घनस्वनैः ॥७५॥ सर्वलोकाभयत्रस्ता ये च त्रैलोक्यवासिनः । भ्रष्टकामागताकाशं घोरं तीव्रं महाहवम् ॥७६॥ परिधैः पाशशूलैश्च खड्गयष्टिपरश्वैः। शरैश्च निशितै घोरै र्जघ्नुरन्योन्यमाहवे॥७७॥ शस्तराततरै बहुधा मुक्तैर्दिशः सर्वा निरंतरम् । विग्रहेषु धरण्यां च पर्वतेषु जलेषु च ॥७८॥ देवस्थाने तथाकाशे पर्वताग्रेषु सानुषु । गह्वरेषु महारण्ये तयोर्युद्धमवर्तत ॥७९॥ पुष्कलादिघनानां च वर्षधाराजलं यथा । पतंत्यस्त्राणि सैन्येषु शतशोऽथ सहस्रशः ॥८०॥ केचित्पेतुः पृथिव्यां तु शरैः संभिन्नविग्रहाः । शक्तिभिर्मुसलैश्चान्ये छत्रशूलपरश्वधैः ॥८ १॥ पतिताः संमुखे शूरा युद्धेषु न्यायवर्तिनः । गच्छति सुरसद्मानि स्वाम्यर्थे येत्वभीरवः ॥८२॥ श्रेष्ठ नारद से कहा ॥६७॥ दैत्यराज ने कहा-- हे ब्राह्मण आज तुम मारने योग्य नहीं हो अतएव मेरे सामने से शीघ्र चले जाओ । तुम अपने सामने देवताओं की विपत्ति तथा उनकी मृत्यु को देखो ॥६८॥ विप्र क्षण भर में ही हरि तथा हर आदि को मरे हुए देखना । व्यासजी ने कहा-- इस तरह से कहकर दैत्यराज ने सेनापति से कहा दैत्यराज ने कहा-- तुम शीघ्र सेना तथा सभी रथों को सजा कर लाओ । व्यासजी ने कहा-- दैत्यराज की वाणी को सुनकर सेनाध्यक्ष ने सारी सेना को ॥७०॥ बुलाया और सबके सब भयभीत हुए सहसा आ गये, करोड़ों-करोड़ अक्षौहिणी दैत्यों की सेना थी ॥७१॥ वाहन तथा रथ बड़े-बड़े तथा अद्भुत थे । हाथी घोड़े तथा गधे भी विचित्र थे॥॥७२॥ वे सब सिंह, व्याघ्र तथा विलाव पर चढकर चल पड़े । अनेक प्रकार के वाद्यों तथा भयङ्कर सिंहनादों से॥७३॥ सभी दिशाएँ भर गयीं, समुद्र चंचल हो गया, पृथिवी काँपने लगी । सभी लोक भयभीत हो गये तथा समुद्र काँपने लगे॥७४। सभी देवताओं ने भी अपनी दुन्दुभि बजायी अनेक वाद्यों तथा वायुपूर्ण मेघों की ध्वनि से ॥७५॥ सभी लोग भयग्रस्त हो गये तथा त्रैलोक्य वासी भी भयभीत हो गये । अपनी कामना के भ्रष्ट हो जाने से वे आकाश में चले गये और भयङ्कर तीव्र महायुद्ध प्रारम्भ हो गया ॥७६॥ परिघ, पाश, त्रिशूल, खड्ग, यष्टि, फरसा तथा तीक्ष्ण भयङ्कर बाणों से एक वीर दूसरे वीर पर प्रहार किए ।।७७॥ अनेक प्रकार के प्रयोग किए गये शस्रों तथा अस्रो से दिशाएँ भर गयीं । गृहरहित स्थानों पर, पृथिवी, पर्वतों पर, जलों में, देवस्थानों में, आकाश में, पर्वतो के ऊपर, शिखरों पर, गुफाओं में और महारण्य में दोनों सेनाओं में युद्ध होने लगा ॥७९। पुष्कर आदि मेधों की जलधारा के समान सेनाओं पर सैकड़ों तथा हजारों अख्रों तथा शस्त्रं का प्रहार हो रहा था ॥८०॥ जिनके बाणों से वीरों का शरीर क्षत-विक्षत हो गया था, शक्ति, मुसल, छत्र, त्रिशूल से मारे गये कुछ वीर पृथिवी पर गिर पड़े ॥८१॥ न्यायानुसार युद्ध करने

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