Srishti Khanda Extracted Page 819

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-819

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

युद्धार्थभथितिष्ठंति निर्जरास्त्वभया मयि | यस्य या शक्तिरस्तीह देवाञ्जेतुं बदत्वलम् ॥५६॥ व्यास उवाच ततो राज्ञो वचः श्रुत्वा मधुर्वचनमब्रवीत् । मधुरुवाच जेष्यामि च हरि राजन्सहायं मे नियोजय ॥५७॥ जिते नारायणे देवा: सभयार्त्रिदशा ध्रुवम् । तस्मान्नारायणोऽस्माकं भागः सर्वपुरंजय: ॥५८॥ व्यास उवाच ततो धुंधुश्च सुंदश्च कालकेयो महाबल: । सहायश्च मधोरस्य जेष्यामो माधवं नृप॥५९॥ सर्व दैत्यबलेमुख्याश्चत्वारो दृढविक्रमाः । कालमृत्युसमा वीराः सर्वास्त्रविधिपारगाः ॥६०॥ बलस्तत्राब्रवीद्वाक्यं यस्मिन् जय उपस्थितः । तं च जेष्यामिजिष्णुं च प्रतिज्ञा मे दृढा नृप॥६१॥ नमुचिश्च मुचिश्चैव भ्रातरौ बलदर्पितौ। ऊचतुस्तौ नृपं ह्यावां जेष्यावो वै बलाद्दलौ ॥६२॥ जम्भश्चैवाब्रवीद्वाक्यमिंद्रमिंद्रपुरोगमान् । जेष्यामि नात्र संदेहो दैत्या भवत विज्वराः॥६३॥ त्रिपुरश्चाब्रवीद्वाक्यं जेष्यामि च विनायकम् । तावदूचेऽथ सेनानीर्मयो देवांतको बली ॥६४॥ कुबेरं प्रतिरक्षोभिः सर्वाश्चैव हिरण्यकान्। एतस्मिन्नंतरे तत्र नारदो मुनिसत्तमः ॥६५॥ गत्वोवाच हिरण्याक्षं जिष्णुदूतोहऽ मागतः । राज्यं त्यजस्व वाचा नः प्राणेषु यदि ते हितम्॥६६॥ न चेद्युध्यस्व मामद्य न वा गच्छ रसातलम् । ततः कोपादुवाचेदं नारदं मुनिसत्तमम् ॥६७॥ दैत्यराज उवाच अहिंस्यस्त्वं ब्राह्मणाद्य गच्छ तूर्णं ममाग्रतः | देवानां च विपत्ति च कदनं निधनं पुरः ॥६८॥ देवता प्रसन्नता पूर्वक हमलोगों का वध कराने की इच्छा से श्रीहरि से निवेदन किया । श्रीहरि की; ठीक है, इस वाणी को सुनकर रथ पर चढकर और हाथ में श्र लेकर ॥५५॥ देवता बिना किसी भय के युद्ध करने के लिए तैयार हैं देवताओं को जीतने के लिए जिसके पास जितनी शक्ति हो वह बतलाये ॥५६॥ उसके बाद मधु दैत्यराज से बोला मधु ने कहा-- राजन् मैं हरि को परास्त करूंगा । आप मेरे सहायकों को नियुक्त करे ॥५७॥ नारायण के परास्त हो जाने पर सभी देवता भयभीत हो जायेंगे । अतएव शत्रुओं को जीतने वाले नारायण ही हमारे भाग में रहेंगे ॥५८॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद धुन्धु, सुन्द तथा कालकेय, जो मधु के सहायक थे उन सबों ने कहा राजन् हमलोग माधव को जीत लेंगे ॥५९॥ सम्पूर्ण दैत्यों की सेना में मुख्य, दृढपराक्रम वाले, काल तथा मृत्यु के समान भयङ्कर वीर चार थे, जो सभी अखों में पारंगत थे ॥६०॥ उनमें बल ने कहा जिसके जीतने पर विजय होती है, उस विष्णु को मैं जीतूगा यह मेरी सुदृढ प्रतिज्ञा है ॥६१॥ नमुचि और मुचि ये दोनों भाई बल के कारण दृप्त थे । उन दोनों ने राजा से कहा-- हमदोनों बलपूर्वक दोनों बलवानों को जीतेंगे ॥६२॥ जम्भ ने कहा हम इन्द्र आदि देवताओं को जीतेंगे । हे दैत्यों ! इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है आपलोग निश्चिंत रहें ॥६३॥ त्रिपुर ने कहा मैं विनायक को परास्त करूंगा । उसी समय सेनापति देवान्तक तथा बलवान् मय ने कहा ॥६४॥ मैं कुबेर तथा उनके राक्षसों को तथा उनके यक्षों को जीतूगाँ । उसी समय मुनियों में श्रेष्ठ नारदजी ने जाकर हिरण्याक्ष से कहा--- मैं विष्णु का दूत होकर आया हूँ, उन्होंने कहा- कि यदि तुमको अपना प्राण प्रिय है तो तुम हमलोगों का राज्य दे दो ॥६५-६६॥ अन्यथा आकर आज मुझसे युद्ध करो या पाताल में चले जाओ । उसके बाद उसने क्रोध से मुनि

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know