Srishti Khanda Extracted Page 815
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-815
Sanskrit Original
धनार्थी विपुलं वित्तं कन्यां साध्वीं मनोरमाम्। ऐश्वर्य धर्मसाध्य॑ च तनयं कुलमोक्षदम् ॥७॥ न रोगैः पीड्यते कश्चिन्न मैः प्रेतयोनिभि: । श्रृंगिभिर्नापि रक्षोभिर्विद्युद्धिर्वनतस्करैः ॥८॥ न राजा कुप्यति गृहे न च मारीप्रवर्तते । न दौर्भिक्ष्यं न दौर्बल्यं पूजयित्वा विनायकम् ॥९॥ अभिप्रेतार्थसिद््यर्थं पूजितो यत्सुरैरपि। सर्वविध्नछिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥१०॥ मंत्रश्नायं 3७ नमो गणपतये । नारायण प्रिये: पुष्यैरन्यैश्चापि सुगंधिभिः। मोदकैः फलमूलैश्च द्रव्यैः कालोद्भवैस्तथा॥११॥ दधिदुग्धैः प्रियैवद्यिरपि धूपसुगंधिभिः। पूजयेद्रणपं यस्तु सर्वसिद्िमवाघ्रुयात्॥९२॥ विशेषात्तस्यलिंगे तु यो ददाति वसुप्रियम्। पूजोपकरणं वस्त्रं सर्वलक्षगुणं भवेत् ॥१३॥ देशे च भारते वर्षे वनितापूर्वसन्निधौ । लौहित्यदक्षिणे तीरे लिंगरूपो विनायकः ॥१४॥ हरगौरीसमादेशाद्देवानां संमतेन च । स्थितो लोकप्रशान्त्यर्थं सर्वविध्नविनाशनात् ॥१५॥ पूजयित्वा तु तं देवं शक्तितो द्रव्यसंचयैः । विनायकत्वमाप्रोति वेदशास्त्रार्थपारगः ॥९६॥ सकृत् प्रदक्षिणं कृत्वा दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा तु मानवः । अक्षयं लभते स्वर्ग सदा देवैः प्रपुज्यते॥९७॥ संसर्गिणां च म्लेछानां गत्यर्थं सुतपस्विनाम्। पुत्रार्थं सर्वलोकानां तत्र शंभुर्विनायकः ॥९८॥ कृत्वाभिषेकं लौहित्ये स्पृशेद्यस्तु गणाधिपम् । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥९९॥ न वैधव्यं नकार्पण्यं न शोकं न तु मत्सरम् । विनायकं समासाद्य जन्मजन्मनि संलभेत्॥२०॥ प्रदान करने वाली पवित्र विद्या तथा शिल्पविद्या को वह प्राप्त कर लेता है । जिससे उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है॥६॥ धनार्थी प्रभूत धन को, सुन्दर साध्वी कन्या को तथा धर्मसाध्य ऐश्वर्य को, एवं वंश भर को मोक्ष प्रदान करने वाले पुत्र को प्राप्त करता है ॥७॥ वह रोगों, ग्रहों, प्रेतयोनि के जीवों से, सींग वाले पशुओं से, राक्षसों से, बिजली से तथा चोरों से कभी पीडित नहीं होता है ।॥८॥ उस पर न तो राजा क्रोध करता है और न घर में महामारी का प्रकोप होता है, दुर्भिक्ष तथा दुर्बलता भी गणेशजी की पूजा करने वाले को नहीं होती है ॥९।। अपने अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति के लिए जो देवताओं द्वारा भी पूजित हैं, उन सभी विघ्नों का विनाश करने वाले गणेशजी को नमस्कार है ॥१०॥ ओम् नमो गणपतये यह गणेशजी का मन्त्र है । भगवान् नारायण को प्रिय पुष्पों से तथा दूसरे सुगन्धित पुष्पों से मिठाइयों से, फलों तथा मूलों से तथा उस समय में उत्पन्न होने वाले द्रव्यो से, दधि, दुग्ध, प्रिय वाद्य एवं सुगन्धित धूप से गणेशजी की पूजा करनी चाहिए । ऐसा करने वाला सभी सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है ॥११-१२॥ विशेष रूप से गणेशजी की मूर्ति पर जो अपनी प्रिय सम्पत्ति को चढाता है, पूजा के उपकरण, सुन्दर वस्र को चढाता है तो उसका फल उसे सौ गुना प्राप्त होता है ॥१३॥ भारतवर्ष में, वन के पूर्व दिशा में विद्यमान, लौहित्य तीर्थ की दक्षिण दिशा में, लिङ्ग रूप विनायक हैं ॥१४॥ शङ्कर तथा पार्वतीजी के आदेश से, देवताओं को अभिमत सभी विघ्नों को विनष्ट करने वाले गणेश संसार को शान्ति प्रदान करने के लिए वहाँ स्थित हैं ॥१५॥ उनकी अपनी शक्ति के अनुसार पूजा करके मनुष्य वेदशास्त्र पारंगत तथा विनायक हो जाता है ॥१६॥ उनकी एक बार प्रदक्षिणा करके, दर्शन तथा स्पर्श करके, मनुष्य अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है तथा देवताओं द्वारा पूजित होता है ॥१७॥। संसर्गियो, म्लेच्छों, तपस्वियों को सुगति प्राप्ति के लिए तथा सभी लोगों को पुत्र प्रदान करने के लिए शम्भु विनायक रूप में स्थित हैं ॥१८॥ जो मनुष्य उनका अभिषेक करके गणेशजी का स्पर्श करता है वह सात जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है ॥१९॥ विनायक का स्पर्श करने वाले को अनेक जन्मों तक
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