Srishti Khanda Extracted Page 814
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-814
Sanskrit Original
स्तूयमानं माहादेहं वन्देऽहं गणनायकम्। गणाष्टकमिदं पुण्यं भक्तितो यः पठेन्नरः ॥९॥ सर्वसिद्धिमवाप्रोति रुद्रलोके महीयते । ननिःस्वतां तथाभ्येति सप्तजन्मसु मानवः ॥१०॥ य इदं पठते नित्यं महाराजो भवेन्नरः । वश्यं करोति त्रैलोक्यं पठनाच्छृवणादपि ॥ स्तोत्रं परं महापुण्यं गणपस्य महात्मनः ॥१९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गणपतिस्तोत्रं नाम चतुष्षष्ठितमोऽध्यायः ॥६४॥ Oe पैसठवाँ अध्याय व्यास उवाच नांदीमुखेषु सर्वेषु पूजयेद्योगणाधिपम् । तस्य सर्वो भवेद्वश्यः पुण्यं भवति चाक्षयम् ॥१॥ गणानां त्वेतिमंत्रेण सर्वयज्ञघटेषु च । सर्वसिद्धिमवाप्रोति स्वर्ग मोक्षं लभेन्नरः ॥२॥ मृण्मये प्रतिमायां च चित्रे चाथ दृषन्मये । द्वारदारुणि पात्रेच हेरम्बं लेखयेद्वुध: ॥३॥ अन्यस्मिन्नपि देशे तु सततं दृष्टिगोचरे । स्थापयित्वा तु हेरंबं शक्तद्या य:पूजयेद्वूधः ॥४॥ तस्य कार्याणि सिद्ध्यंति दयितानि समंततः। न विध्नं जायते किंचित्त्रैलोक्यं वशमानयेत् ॥५॥ विद्यार्थी लभते विद्यां वेदशास्त्रसमुद्धवाम् । अन्यां च शिल्पिविद्यां च विजयां स्वर्गदायिनीम्॥६॥ में वन्दना करता हूँ ॥८॥ गणाष्टक नामक इस स्तोत्र को जो मनुष्य भक्ति पूर्वक पाठ करे वह सभी सिद्धियों को प्राप्त करके रुद्र के लोक में पूजित होता है ॥९॥ वह मनुष्य सात जन्मों तक कभी दरिद्र नहीं होता है, जो इस स्तोत्र का नित्य पाठ करे वह महाराज हो जाय ॥१०॥ इस स्तोत्र को पढने तथा सुनने वाले के वश में त्रैलोक्य हो जाय, यह महात्मा गणेशजी का स्तोत्र अत्यन्त पवित्र है ॥११॥ इस तरह श्रीपद़महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड का गणेशाष्टक वर्णन नामक चौसठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६४।। ee नान्दीमुख आदि में गणेशजी की अग्र पूजा का वर्णन, गणेशजी द्वारा देवताओं को वरदान, भगवान् विष्णु की आज्ञा से देवताओं का असुरों के साथ युद्ध, चित्ररथ द्वारा कालकेय का वध वर्णन व्यासजी ने कहा-- जो मनुष्य सभी नान्दीमुखो में गणेश जी की पूजा करता है, उसके अधीन सारा संसार हो जाता है तथा उसको अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है ।। १॥ गणानां त्वा इत्यादि मन्त्र के द्वारा जो सभी यज्ञों तथा कलशों में पूजा करता है, वह सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है तथा स्वर्ग एवं मोक्ष को प्राप्त करता है ॥२॥ कलश पर, प्रतिमा पर, चित्र पर तथा पत्थर से बने द्वार, लकड़ी तथा पात्र पर, गणेशजी का चित्र बनवाये॥३॥ दूसरे भी सदा दिखायी देने वाले स्थानों पर गणेशजी की स्थापना करके विज्ञ पुरुष को अपनी शक्ति के अनुसार उनकी पूजा करनी चाहिए ॥४।। ऐसा करने वाले के सभी प्रिय कार्य सिद्ध होते हैं, उसको कोई भी विघ्न नहीं होता है और उसके वश में त्रैलोक्य हो जाता है ॥५॥। विद्याथी वेद शास्त्रों से उद्भूत विद्या को तथा सर्वत्र विजय
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