Srishti Khanda Extracted Page 813
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-813
Sanskrit Original
श्रीपदामहापुएण विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विध्नं भवेत् क्वचित्। महाप्रेताशशमं यांति पीड्यते व्याधिभिर्न च ॥ सर्वपापाह्विनिर्मुक्तो ह्लाक्षयं स्वर्गमश्नुते ॥३९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गणपतिस्तोत्रं नाम त्रिषष्ठितमोऽध्यायः ॥६३॥ -क्््य6-- चौसठवाँ अध्याय व्यास उवाच पुनरन्यत्प्रवक्ष्यामि स्तोत्रं गणाधिपस्य च । सर्वसिद्धिकरं पूतं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ॥१॥ एकदंतं महाकायं तप्तकांचनसन्निभम् । लंबोदरं विशालाक्षं वंदेऽहं गणनायकम् ॥२॥ मुंजकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतकम्। बालेंदुकलिकामौलिं बंदेहं गणनायकम् ॥३॥ सर्वविघ्नहरं देवं सर्वविध्नविवर्जितम् । मूषकोत्तममारुह्य देवासुरमहाहवे ॥४॥ योद्धकामं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम् । अंबिकाहृदयानन्दं मातृकापरिवोष्टितम् ॥५॥ भक्तिप्रियं मदोन्मत्तं वन्देऽहं गणनायकम् । चित्ररत्मविचित्रांगं चित्रमालाविभूषणम् ॥६॥ कामरूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् । गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं चारुकर्णविभूषितम् ॥७॥ पाशांकुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम्। यक्षकिन्नरगंधर्वैः सिद्धविद्याधरैस्सदा ॥८॥ संसार उसके वश में हो जाता हे, उसको कहीं विघ्न नहीं होता है । महाप्रेत की भी शान्ति हो जाती है वह कभी व्याधियों से पीडित नहीं होता है । सभी पापों से मुक्त होकर वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥३१॥ इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के गणपति स्तोत्र वर्णन नामक तिरसठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।६३।। rie गणेश स्तोत्र व्यासजी ने कहा-- मैं गणेशजी का दूसरा स्तोत्र बतलाता हूँ । यह पवित्र, सभी सिद्धियो को प्रदान करने वाला तथा समस्त अभीष्ट फलों को प्रदान करने वाला है ॥१॥ में एक दाँत वाले, विशालकाय, तप्तकाञ्चन के समान कान्ति वाले, लम्बोदर, विशाल नेत्रों वाले, गणनायक की वन्दना करता हूँ । मौञ्जी मेखला, कृष्णमृगचर्म तथा नागमय यज्ञोपवीत धारण करने वाले, शिर पर बाल चन्द्र को धारण करने वाले, देव सभी विघ्नो से रहित, चूहे के ऊपर चढकर देवासुर संग्राम में युद्ध करने की कामना वाले, महाबाहु गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ ॥४॥ अम्बिका के हृदय में आनन्द देने वाले, मातृकाओं से घिरे रहने वाले, भक्तप्रिय, मदोन्मत्त, गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ ॥५। अद्भुत रत्नों से निर्मित विचित्र अङ्गों वाले, विचित्र माला तथा भूषणों को धारण करने वाले, अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाले देव गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ ॥६।। हाथी के मुख वाले, देवों मेंश्रेष्ठ सुन्दर कान तथा विभूषण वाले, पाश तथा अङ्कुश धारण करने वाले, देव गणनायक की मैं वन्दना करता हूँ॥७॥ सदा यक्ष, किन्नर गन्धर्व, सिद्ध तथा विद्याधरों के द्वारा, स्तुति किये जाने वाले महान् देवता गणनायक की
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