Srishti Khanda Extracted Page 812
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-812
Sanskrit Original
महादेव उवाच अस्यैव कारणादस्य अग्रे पूजा मखेषु च | वेदशास्त्रस्तवादौ च नित्यं पूजाविघासु च ॥९७॥ पार्वत्या सह भूतेशो ददौ तस्मै वरं महत् । अस्यैव पूजनादग्रे देवास्तुष्टा भवंतु च॥१८॥ सर्वासामपि देवानां पितृणां च समंततः । तपो भवतु नित्यं च पूजितेऽग्रे गणेश्वरे ॥१९॥ व्यास उवाच ततः सर्वेषु यज्ञेषु पूजयेद् गणपं द्विजः । कोटिकोटिगुणं तेषु देवदेवीवचो यथा॥२०॥ दत्वा सर्वगुणं पुण्यं देवदेव्या तथा मुदा । कृतं गणाधिपत्यं च सर्वदेवाग्रतस्तदा ॥२१॥ तस्मात्प्राज्येषु यज्ञेषु स्तोत्रेषु नित्यपूजने । गणेशं पूजयित्वा तु सर्वासिद्धिं लभेन्नरः ॥२२॥ एवं ज्ञात्वा तु देवैस्तु दयितप्राप्तिकाम्यया । पूजितश्चाथ सर्वैस्तु स्वर्गमोक्षार्थतो ध्रुवम् ॥२३॥ नक्ताहारश्चतुर्थ्या तु पूजयित्वा गणाधिपम् । लिंगे वा प्रतिमाचित्रे देवः पूज्यो भवेद्यदि ॥२४॥ गणाधिप नमस्तुभ्यं सर्वविध्नप्रशांतिदा । उमानंदप्रद प्राज्ञ॒ त्राहि मां भवसागरात् ॥२५॥ हरानंदकर ध्यानज्ञानविज्ञानद प्रभो । विध्नराजनमस्तुभ्यं प्रसन्नो भव सर्वदा॥२६॥ कृतोपवासो गणपं पूजयेद्यो नरो मुदा । सर्वपापविनिर्मुक्तः सुरलोके महीयते ॥२७॥ स्तोत्रं तस्य प्रवक्ष्यामि नामद्दादशकं शुभम्। ओ नमो गणपतये मंत्र एष उदाहतः ॥२८॥ गणपतिर्विध्नराजो लंबतुंडो गजाननः । द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिपः ॥२९॥ विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः । द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्॥३०॥ यज्ञां में सबसे पहले पूजा होगी । वेद शास्त्र तथा स्तोत्र के आदि में तथा नित्य पूजाओं में पार्वती के साथ गणेशजी तुम्हारी पूजा होगी यह वरदान शङ्करजी ने दिया । इसी की अग्रपूजा होने से सभी देवता सन्तुष्ट हों ॥१७-१८॥ सभी देवताओं और पितरों की तपस्या पहले गणेश की पूजा से ही नित्य होए ॥१९॥ व्यासजी ने कहा-- इसलिए ब्राह्मण को सभी यज्ञं में सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करनी चाहिए । उन सबों में करोड़ों देवियों और देवों का इस प्रकार का वचन है ॥२०॥ इसतरह सभी गुण से युक्त पवित्र मोदक देकर देवी पार्वती और शङ्करजी ने गणेशजी को सभी देवताओं के सामने ही गणाधिप बना दिया ॥२१॥ अतएव समृद्ध यज्ञां में स्तोत्र पाठ में तथा नित्य पूजन में सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करके मनुष्य समस्त सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है ॥२२॥ इस बात को जानकर देवताओं ने अपने अभिप्रेत अर्थ की प्राप्ति की कामना से तथा स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए गणेशजी की पूजा की ॥२३॥ चतुर्थी तिथि को दिनभर उपवास करने के बाद रात्रि में गणेशजी पर या चित्र पर पूजा करे ॥२४॥ गणेशजी की प्रार्थना करते हुए कहे-- हे सभी विघ्नों को शान्त करने वाले गणेशजी आपको नमस्कार है । हे पार्वतीजी को आनन्द प्रदान करने वाले प्राज्ञ इस संसार सागर से आप मेरी रक्षा करें ॥२५॥ हे शङ्करजी को आनन्दित करने वाले ज्ञान विज्ञान को प्रदान करने वाले प्रभो, हे विघ्नराज ! आपको नमस्कार है, आप सदा प्रसन्न रहें ॥२७॥ जो मनुष्य दिनभर उपवास करके गणेशजी की पूजा प्रसन्नता पूर्वक करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर देवलोक में पूजित होता है ॥२७॥ मैं गणेशजी के द्वादश नामों वाले स्तोत्र को बतलाता हूँ । ओं नमो गणपतये यह गणेशजी की पूजा का मन्त्र है ॥२८॥ गणपति, विघ्नराज, लम्बोदर, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्ब, एकदन्त, गणाधिप ॥२९॥ विनायक, चारुकर्ण, पशुपाल, और भवात्मज, गणेशजी के इन बारह नामों को प्रातःकाल जगकर जो पढता है ॥३०॥ सारा
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