Srishti Khanda Extracted Page 811
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-811
Sanskrit Original
श्रीपद्य महापुराण पार्वत्यजनयत्पूर्व सुतौ महेश्वरादिमौ । सर्वलोकधरौ शूरौ देवौ स्कंदगणाधिपौ॥५॥ तौ च दृष्ट्वा नगसुता सिध्यर्थ पर्यभाषत । छ पार्वत्युवाच इदं तु मोदकं पुत्रौ देवैर्दत्तं मुदान्वितैः ॥६॥ महाबुद्धीति विख्यातं सुधया परिनिर्मितम् । गुणं चास्य प्रवक्ष्यामि श्रृूणु तं तु समाहितौ ॥७॥ अस्यै वाघ्राणमात्रेण अमरत्वं लभेद्ध्रुवम् । सर्वशास्तरार्थतत्वज्ञः सर्वशस्त्रास्त्रकोविदः ॥८॥ निपुणः सर्वतंत्रेषु लेखकश्षित्रकृत्सुधी: । ज्ञानविज्ञानतत्त्वज्ञः सर्वज्ञो नात्र संशयः ॥९॥ पुत्रौ धर्मादधिकतां प्राप्य सिद्धिशतं ब्रजेत् । यस्तस्य वै प्रदास्यामि पितुस्तेसंमतंत्विदम् ॥१०॥ व्यास उवाच श्रूत्वा मातृमुखादेवं वचः परमकोविदः । स्कंदस्तीर्थं ययौ सद्याः सर्व त्रिभुवनस्थितम् ॥१९॥ बर्हिणं स्वंसमारुह्या त्वभिषेकः कृतः क्षणात् । पितरौ प्रदक्षिणं कृत्वा लंबोदरधरस्सुधीः ॥९२॥ तत एव मुदा युक्त: पित्रोरेवाग्रतस्थितः । पुरतश्च तथास्कंदो मे देहीति ब्रुवन् स्थितः ॥१३॥ ततस्तु तौ समीक्ष्याथ पार्वती विस्मिताब्रवीत् । पार्वत्युवाच सर्वतीर्थाभिषेकैस्तु सर्वदेवैर्नतैस्तथा ॥१४॥ सर्वयज्ञव्रतैर्मत्रैयोंगैरन्यैर्यमैस्तथा । पित्रोरर्चाकृतः कोपि कलां नार्हति षोडशीम्॥१५॥ तस्मात्सुतशतादेषोधिकः शतगुणैरपि। अतो ददामि हेरंबं मोदकं देवनिर्मितम् ॥१६॥ करनी चाहिए । गौरीजी के पुत्र गणेशजी ने विनायकत्व को कैसे प्राप्त किया 2॥४॥ पार्वतीजी ने शिवजी के समस्त लोकों को धारण करने वाले तथा शूरवीर स्कन्द और गणेशजी दो पुत्रों का जन्म दिया ॥५॥ उन दोनों को देखकर पार्वतीजी ने प्रसन्नता पूर्वक कहा । पार्वतीजी ने कहा-- हे पुत्रों ! प्रसन्न होकर देवताओं ने इस मोदक को प्रदान किया है ॥६॥ यह अमृत से बना हुआ और महाबुद्धि प्रदान करने वाला है । इसके गुणों को में बतलाती हुँ; उसे सावधानी से तुम दोनों सुनो ॥७॥ इसको केवल सूंघ लेने वाले को अमरत्व की प्राप्ति हो जाती है । वह सभी शास्रं के तत्त्वों को जानने वाला तथा सभी शास्रं में पारङ्गत हो जाता है ॥८॥ वह सभी त्रं में निपुण, लेखक तथा चित्रों को बनाने वाला हो जाता है । ज्ञान और विज्ञान के तत्त्वो को जानने वाला और तथा सर्वज्ञ हो जाता है ॥९॥ हे पुत्रों! वह अत्यधिक धर्मो को प्राप्त करके सैकड़ों सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है । तुम दोनों में से जो ऐसा होगा उसे ही मैं इस मोदक को दूँगी यह तुम्हारे पिता की सम्मति है ॥१०॥ माता के मुख से इस वाणी को सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् स्कन्दजी त्रैलोक्य के तीर्थो की यात्रा करने के लिए मयूर पर बैठकर निकल पड़े और शीघ्र ही सभी तीर्थो में स्नान कर लिए । बुद्धिमान गणेशजी अपने माता-पिता की परिक्रमा वहीं करके उनके सामने खड़े हो गये । उसके बाद में आकर स्कन्दजी ने कहा कि मोदक मुझे प्रदान करें ॥१२-१३॥ उसके बाद अपने दोनों पुत्रों को देखकर पार्वतीजी आश्चर्यित हो गयीं और बोलीं । पार्वतीजी ने कहा-- सभी तीर्थो में स्नान करने, सभी देवताओं को नमस्कार करने ॥१४॥ समस्त यज्ञं, ब्रतों, मंत्रों, योगों तथा अन्य नियमों के पालन से माता-पिता की पूजा से प्राप्त होने वाले फल का सोलहवाँ भी अंश नहीं मिलता है ॥१५॥ अतएव यह सैकड़ों पुत्रों से भी तथा सैकड़ों गुणों से श्रेष्ठ है अतएव मैं गणेश को ही देवर्निमित मोदक दे रही हूँ ॥१६॥ महादेवजी ने कहा-- इसीलिए इसकी सभी
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