Srishti Khanda Extracted Page 810

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-810

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Sanskrit Original

ततस्ते ब्राह्मणा हृष्टाः श्रुत्वा व्यासात्तिरं शुभाम् । गंगायां तु तपस्तप्त्वामोक्षमार्ग ययुस्तदा ॥ १ २१॥ य इदं शृणुयान्मर्त्यः पुण्याख्यानमनुत्तमम् । सर्व तरति दुःखौघं गंगास्नानफलं लभेत् ॥१२२॥ सकृदुचारिते चैव सर्वयज्ञफलं लभेत् । दानं जप्यं तथाध्यानं स्तोत्रं मंत्रसुरार्चनम्॥१२३॥ तत्रैव कारयेद्यस्तु स चानंतफलं लभेत् । तस्मात्तत्रैव कर्त्तव्यं जपहोमादिकं नरैः ॥९२४॥ अनंतं च फलं प्रोक्तं जन्मजन्मसु लभ्यते ॥१२५॥ इति श्रीपदामहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे गंगामाहात्म्य नाम द्विषष्ठितमोऽध्यायः ॥६२॥ पणि तिरसठवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच एतस्मिन्नंतरे पूर्व॑ व्यासशिष्यो महामुनिः। नमस्कृत्य गुरुं भीष्म संजयः परिपृच्छति ॥१॥ संजय उवाच देवानां पूजनोपायं क्रमं ब्रूहि सुनिश्चितम् । अग्रे पूज्यतमः कोसौ को मध्यो नित्यपूजने ॥२॥ अंते च पूजा कस्यैव कस्यको वा प्रभावकः। किं वा किंच फलं ब्रह्मन्पूजयित्वालभेन्नरः॥३॥ व्यास उवाच गणेशं पूजयेदग्रे त्वविध्नार्थंपरेत्विह । विनायकत्वमाप्रोति यथागौरीसुतो हि सः ॥४॥ > करने वाली हैं । कृछू तपस्या करने से जिनके शरीर क्षीण हो गये हैं उनको अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है ॥१२०॥ उसके बाद व्यासजी के मुख की वाणी को सुन करके ब्राह्मण सन्तुष्ट हो गये और गङ्गा तट पर तपस्या करके मोक्षमार्ग को प्राप्त कर लिए ॥१२१॥ जो मनुष्य इस उत्तम आख्यान को सुनता है, वह सभी दुःखें को पार कर जाता है तथा गङ्गा स्नान का फल प्राप्त करता है ॥१२२॥ इसका एक बार पाठ करने से सभी यज्ञों का फल प्राप्त हो जाता है । अतएव दान, मन्त्र, जप, ध्यान, स्तोत्रपाठ, मन्त्रपाठ तथा देवताओं की पूजा ॥१२३॥ वहीं पर (गङ्गा तट पर) जो करता है, वह अनन्त फलों को प्राप्त करता है । अतएव मनुष्यों को गङ्गातट पर जप तथा होम आदि करना चाहिए ॥१२४॥ ऐसा करने वाला अनन्त फलों को अनेक जन्मों में प्राप्त करता है ॥१२५॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के गङ्गा महात्म्य वर्णन नामक: बासठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६२।। —— ke गणेशजी की अग्रपूज्यता का वर्णन, पार्वतीजी के प्रेम की कथा पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे भीष्म ! उसी समय व्यासजी के शिष्य संजय महर्षि ने अपने गुरु को नमस्कार करके पूछा ॥१॥ संजय महर्षि ने कहा-- आप मुझे देवताओं के पूजन के साधन तथा क्रम को बतलायें नित्य के पूजन में किसकी पूजा सबसे पहले करनी चाहिए ? तथा किसकी पूजा सबसे मध्य में करनी चाहिए ॥२॥ किस देवता की पूजा अन्त में करनी चाहिए ? किस देवता का प्रभाव क्या है ? हे ब्रह्मन् किस देवता की पूजा करने से किस फल की प्राप्ति होती है ?2॥३॥ व्यासजी ने कहा-- विघ्न नहीं होने के लिए सबसे पहले गणेशजी की पूजा

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