Srishti Khanda Extracted Page 808

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-808

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

आद्या भवस्व लोकानां त्वत्तो भवं सृजाम्यहम्। एतच्छुत्वा परा सा च सप्तधा चा भवत्तदा ॥९०॥ गायत्री वाक्त्र च स्वर्लक्ष्मीस्सर्वसस्यवसुप्रदा । ज्ञानविद्या उमा देवी शक्तिबीजा तपस्विनी ॥९९॥ वर्णिका धर्मद्रवा च एतास्सप्तप्रकीर्तिताः । गायत्री प्रभवो वेदा वेदात्सर्व स्थितं जगत् ॥९२॥ स्वस्ति स्वाहा स्वधा दीक्षा एता गायत्रिजास्मृताः । उच्चरयेत्सदा यज्ञे गायत्री मातृकादिभिः ॥९३॥ क्रतौ देवाः स्वधां प्राप्य भवेयुरजरामराः । ततस्सुधारसं देवा मुमुचुर्धरणीतले ॥९४॥ अथ सस्यवती पृथ्वी ओषधीनां परा शुभा। फलमूलै रसै भक्ष्यैर्जनाः सुस्थतराभवन् ॥९५॥ भारती सर्वलोकानां चानने मानसे स्थिता। तथैव सर्वशास्रेषु धर्मोद्देशं करोति सा॥९६॥ विज्ञानं कलहं शोकं मोहामोहं शिवाशिवम् । तयाविना जगत्सर्वं यात्यतत्त्वमितिस्मृतम् ॥९७॥ कमलासंभवश्चैव वस्त्रभूषणसंचयः । सुखं राज्यं त्रिलोके तु ततः सा हरिवल्लभा ॥९८॥ उमया हेतुना शांभोज्ञानं लोकेषु संततम् । ज्ञानमाताच सा ज्ञेया शंभोरर्धाङ्गवासिनी ॥९९॥ बर्णिका शक्तिरत्युग्रा सर्वलोकप्रमोहिनी । सर्वलोकेषु लोकानां स्थिति संहारकारिणी ॥९००॥ देव्या ` च निहतौ पूर्वमसुरौ मधुकैटभौ । रुरुश्चापि हतो घोरः सर्वलोकपरिश्रुतः ॥१०९॥ सर्वदेवैकजेतारं 7: सांजध्नेःः- महिषासुरम् । निहता लीलया देव्या येऽ सुरा दैत्यपुंगवाः ॥१०२॥ एवं : बलानिः दैत्यानां निहत्या सर्वदा :तय़ा ।. पालितं मोदितं चैव कृत्स्नमेतज्जगत्यम्॥९०३॥ धर्मद्रवस्वरूपा च _ सर्वधर्मप्रतिष्ठिता। महती तां समलोक्य मयाकमंडलौ धृता ॥१०४॥ विष्णुपादाब्जसम्मूता शंभुना शिरसा घृता । अस्माभिश्चत्रिभिर्युक्ता ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥१०५॥ हुए मैंने प्रकृतिं रूपिणी माया को कहां तुम जगते का आंदि कारणं बनो | मैं तुमसे ही जगत् की सृष्टि करूंगा । इस वात को सुंनेकर 'परां प्रकृतिं सात रूंपों में हो गयी ।।९०॥। गायत्री, वाक्स्वरूपा सरस्वती, सब प्रकार के धन धान्य कों प्रदान करने वाली लक्ष्मी, ज्ञान तंथां विद्यां स्वरूपा उमादेवी, शक्ति बीजा तपस्विनी और धर्मद्रवो'। ये साति परा प्रकृति के' रूप हैं ॥ इनमें गायत्री से सभी वेद प्रकट हुए और वेद 'सम्पूर्ण जगत् की स्थिति है॥ ९'१-९:२॥ स्वस्ति स्वांहा, स्वधां: और दीक्षा भी गायत्री से उत्पन्न कहीं गयी हैं । यज्ञ में संदैव 'गोयत्री' का मातृको के साथ उच्चारण करना चाहिएँ ॥।९:३॥। यज्ञ में देवता स्वाहा को प्राप्त करके अजर, अमरे हो'गये'।। इसीलिए देवताओं मे परथिवी पर अमृत रस गिराये॥।९४॥।उसके बादें संस्यों से भरी' हुयी ओषेधियों (अंत्रो) के लिए अत्यन्त कल्याणकारिणी हुयी” और लोगं, फर्ल, मूल) और भक्ष्यं रसों से अत्यन्त' सुखी हो' गये ॥९४॥ सरस्वती सभी लोगों -के' ममे तथा मुखं में स्थित हुयी ।' इसीलिए वह संभी शाखों में धर्मो कॉ वर्णन करती हैं॥९ ६॥ उसके बिना विज्ञान, कलह) शोके) मोह अमोह,तकल्याणं; अकेल्याण रूप॑“सम्पूर्ण जंगंत् तंत्त्वहीन ही जाता 'है॥९७॥ लक्ष्मी से, वंख्र, भूषणे, सुख तथो रझ त्रैलोक्य में होता: है, इसीसे लक्ष्मीजी श्रीहरि की 'बल्लंभां'है' ॥९८॥ उमा के ही द्वारा शम्भुं को ज्ञान लोक में फैला उमा को' ज्ञान की “माता शम्भु की अंद्धद्ठिवासिनी'समझंमा चोहिए ॥९९॥ उग्रा ही वर्णो की: शक्ति हैं) वह सम्पूर्ण लोक की “मोहित करंती है! । वही संभी लीकीं में स्थिति "तथा संहार' को करती हैं ॥१९० 6॥ पूर्वकाल में देवी नें मधु और कैंटर्भ को मार दिंयाँ ॥ संम्पूर्ण संसार में' प्रख्यात भर्यक्वैर रुरुं नामक दैत्य मोरा गया ॥१४ १॥ सभी देवताओं को जीत लेने वाले 'महिषांसुर को देंवी में मोर दिया । देवी नें! आसानी से' बेड़े-बड़े दैत्यों को मारा ॥ १ ०२) इसतरह से दैत्यों को “मारकर सर्वदा देवी नें त्रैलोक्य की पीलन"कियाँ और! उसे ''प्रसन्न ' किया ।।१० ३१ धर्मद्रव

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know