Srishti Khanda Extracted Page 807
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-807
Sanskrit Original
। गंगापुण्यफलं विप्राः कुधियः पतिताधमाः ॥७९॥ पाठयंति जना ये च श्रद्धया निपठंति च । गच्छंति ते दिवं धीरास्तारयंतिपितृन्गुरून् ॥८ ०॥ पाथेयकंगच्छतांयोवसुशक्ताप्रयच्छति । भागीरथ्यालभेत्स्नानं यः परान्नेनगच्छति ॥८ ९॥ कर्तुः स्नानफलंविद्याद्दिगुणं प्रेरकस्य च । इच्छायानिच्छया चापि प्रेरणेनान्यसेवया ॥८ २॥ जाह्नवीं योगतःपुण्यां सगच्छेन्निजरालयम्। द्विजा ऊचुः कर्तुः स्नानफलंबिद्याद्द्विगुणं प्रेरकस्य च । पा कीर्तनंव्यास श्रुतं त्वत्तोविनिर्मलम् ॥८३॥ द्विजा ऊचुः गंगाकस्मात्किमाकारा कुतः साह्यातिपावनी । व्यास उवाच शृणुध्वं कथयाम्यद्य कथां पुण्यां पुरातनीम् ॥८ ४॥ यां श्रुत्वा मोक्षमार्ग च प्राप्रोतिनरसत्तमः । ब्रह्मलोकं पुरा गत्वा नारदो मुनिपुगवः ॥८५॥ नत्वाविधिच्यप्रच्यूतत्रैलोक्यपावनम् । किंसृष्टंचत्वयातातसंमतंशंभुकृष्णयोः ॥८६॥ सर्वलोकहितार्थाय भुवः स्थाने समीहितम् । देवी वा देवता का वा सर्वासामुत्तमोत्तमा ॥८७॥ यां समासाद्य देवाश्च दैत्यमानुषपन्नगाः। अंडजाः स्वेदजा वृक्षा ये चान्य उद्धिज्जादय:॥८ ८॥ सवें यांति शिवं ब्रह्मन्समग्रं विभवं ध्रुवम् । ब्रह्मोवाच सृजता च पुरा प्रोक्ता मायाप्रकृतिरूपिणी ॥८९॥ गङ्गाजी के नामो का कीर्तन नहीं करते हैं तथा दूसरों को उसका उपदेश भी नहीं देते हैं, वे ही वातुल और भ्रान्त मनुष्य हैं ॥७८॥ हे विप्रो ! जो दूषित बुद्धि वाले गङ्गा के पवित्र फलों का अध्ययन नहीं करते है, वे उनका शास्त्राध्ययन व्यर्थ है ॥७९॥ जो लोग श्रद्धा पूर्वक पढ़ते हुए दूसरों को गङ्गाजी का माहात्म्य सुनाते हैं, वे धीर पुरुष स्वर्गलोक में जाते हैं और अपने पितरों तथा गुरुजनों को तार देते हैं ॥८०॥ जो गङ्गा जाने वालों को रास्ते का भोजन तंथा धन अपनी शक्ति के अनुसार प्रदान करते हैं, वह परान्न के द्वारा जाते हुए लोगों के गङ्गा स्नान करने का फल प्राप्त करता है ॥८१॥ गङ्गा स्नान करने वाले की अपेक्षा उसको स्नान करने की प्रेरणा देने वाले को दो गुना ज्ञान और फल होता है) इच्छा, अनिच्छा तथा प्रेरणा तथा दूसरों की सेवा से ॥८२॥ जो पवित्र गङ्गाजी में स्नान करने के लिए जाता है, वहं देवलोक में जाता है । द्विजों ने कहा-- हे व्यासजी ! हमलोगों ने आपके मुख से गङ्गाजी:का निर्मल कीर्तन सुना ॥८३॥। गङ्गा किससे उत्पन्न हुयी है? उनका आकार क्या है ? और वे क्यों अत्यन्त पवित्र हैं ? 'व्यासजी ने कहा--- आपलोग सुनें मैं पुरानी तथापवित्रकथा सुनाता हूँ ॥८४॥ उसका श्रवण करके मनुष्य मोक्ष मार्ग की प्राप्त कर लेता है, प्रांचीन' काल में नारदजी ब्रह्मलोक में गये ॥८ ५॥ वे अनेक प्रकार की पवित्र बातों को ब्रह्माजी से पूछे । हे तात ! आपने भगवान् शिवे तथा भगवान् विष्णु के अनुकूल किस चीजकी सृष्टि कीहै ?॥८६॥ जो पृथिवी पर रहने वाले जीवों के लिए अभिग्रेत तथा कल्याणकारी हो । सबों में उत्तम देवो अथवा देवता कौन है 2॥८७॥ जिसको प्राप्त करके देवता, दैत्य, मनुष्य, सर्प, अण्डज, स्वेदज तथा वृक्ष आदि उद्भिज आदि ॥८८॥ सबके संब समस्त ऐंश्वर्यों केसाथ परम कल्याणको प्राप्त करते है| ब्रह्माजी ने कहा- सृष्टि करते
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