Srishti Khanda Extracted Page 806

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-806

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Sanskrit Original

जाह्नवीतीरसंभूतां मृदं मूर्ध्ना बिभर्ति यः । सर्वपापविनिर्मुक्तो गंगास्नानं विना नरः॥६४॥ गंगाजलोर्मिनिर्धूतपवनं स्पृशते यदि । स पूतः कल्मषाद्धोरात्स्वर्गंचाक्षयमश्नुते ॥६५॥ यावदस्थिमनुष्यस्य गंगातोये प्रतिष्ठति । तावद्वर्षसहसतराणि स्वर्गलोके महीयते ॥६६॥ पित्रोर्बुधुजनानां च अनाथानां गुरोरपि। गंगायामस्थिपातेन नरः स्वर्गा्न हीयते ॥६७॥ गंगां प्रतिवहेद्यस्तु पितृणामस्थिखंडकम्। पदे पदेश्वमेधस्य फलं प्राप्रोति मानव: ॥६८॥ धन्या जानपदा ये च पशवः पक्षिकीटकाः । स्थावरा जंगमाश्चान्ये गंगातीरसमाश्रिताः ॥६९॥ क्रोशान्तरमृता ये च जाह्वव्या द्विजसत्तमाः । मानवा देवतास्संति इतरे मानवा भुवि ॥७०॥ गंगास्नानाय संगच्छन्पथि संप्रियते यदि । स च स्वर्गमवाप्रोति गंगास्नानफलं लभेत् ॥७१॥ गंगाजले प्रयास्यंति ते जीवाः पथि ये मृताः । कीटाः पतंगाशशलभाः पादाघातेन गच्छताम् ॥७२॥ ये वदंति समुद्देशं गंगां प्रतिजनंद्विजाः । ते च यांति परं पुण्यं गंगास्नानफलं नराः ।!७३॥ जाहूवी ये च निंदंति पाषण्डैर्हतचेतसः। ते यांति नरकं घोरं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥७४॥ दुस्थो वापि स्मरन्नित्यं गंगेतिपरिकीर्तयन्। पठन्स्वर्गमवाप्रोति किमन्यैर्बहुभाषितैः ॥७५॥ गंगागंगेति यो ब्रूयाद्योजनानां शतैरपि । मुच्यत्ते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं सगच्छति॥७६॥ अंधाश्चपंगवस्ते च वृथभवसमुद्धवा: । गर्भपाताद्विपद्यंते यो गंगानगतानरः ॥७७॥ नकीर्तयंतिये गंगांजडतुल्या नराधमाः । परान्नोपदिशंतिस्मवातूलाश्चित्तविभ्रमाः ॥७८॥ नमो गङ्गायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः अर्थात् विश्व स्वरूपिणी नारायणी गड्भाजी को बारम्बार नमस्कार है॥६३॥ जो मनुष्य गंगातट की मिट्टी को अपने शिर पर धारण करता है, वह गङ्गा स्नान किये बिना ही सात जन्मों के पापों से शुद्ध हो जाता है ॥६४॥ गङ्गाजी की लहरियों का स्पर्श करके आती हुयी वायु, जिसका स्पर्श करती है, वह घोर पाप से पवित्र होकर अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥६५॥ गङ्गाजी में मनुष्य की हड्डी जब तक रहती है, उतने हजार वर्ष पर्यन्त वह मनुष्य स्वर्गलोक में पूजित होता है ॥६६॥ जो मनुष्य माता-पिता बांन्धवों, अनाथों तथा गुरु की अस्थि को गङ्गाजी में डालने का काम करता है, उस मनुष्य का स्वर्ग से कभी भी पतन नहीं होता है ॥६७॥ जो अपने पितरों की हड्डी को गङ्गाजी में ले जाकर डालता है, वह पद-पद पर अश्वमेध याग करने का फल प्राप्त करता है ॥६८॥ गङ्गा के तीर पर रहने वाले, जनपद, पशु पक्षी, कीड़े, स्थावर, जङ्गम तथा दूसरे जीव धन्य हैं॥६९॥ जो मनुष्य गङ्गाजी से एक कोश के भीतर ही मरते हैं हे द्विजश्रेष्ठ ! वे मानव देवता होते हैं तथा प्रथिवी पर रहने वाले दूसरे जीव मनुष्य होते हैं ॥७०॥ यदि कोई गङ्घा में स्नान करने के लिए जाते हुए रास्ते में ही मर जाता है, वह भी गङ्गा स्नान के फल को प्राप्त करके स्वर्ग को प्राप्त कर लेता है ॥७१॥ जो कीट, पतंग, कीड़े गङ्गाजी के रास्ते में मर जाते हैं वे गङ्गा स्नान करने के लिए जाते हुए लोगों के पदाघात से लगाकर गङ्गाजी में पहुँच जाते हें ॥७२॥ जो ब्राह्मण गङ्गाजी का नाम लेकर लोगों से बातें करते हैं, वे गङ्गा स्नान के परम पवित्र फलको प्राप्त करते हैं ॥७३॥ जो पाखण्डी लोग गङ्गाजी की निन्दा करते हैं वे घोर नरक में जाते हैं और उनका मनुष्य योनि में जन्म नहीं होता है ॥७४॥ जो गङ्गा के नामों का कीर्तन करते हुए गङ्गाजी से दूर रहते हैं, वे भी स्वर्ग को प्राप्त कर लेते हैं, बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ?॥७५॥ जो गङ्गाजी से सैकड़ों योजन दूर रहकर गङ्गाजी के नाम का स्मरण करते हैं, वे सभी पापों से मुक्त होकर भगवान् विष्णु के लोक में जाते हैं ॥७६॥ जो मनुष्य कभी गङ्गाजी का दर्शन नहीं किए वे ही वस्तुतः अन्धे, लंगड़े तथा व्यर्थ जन्म लेने वाले गर्भपात से मरते हैं ॥७७॥ जो नराधम

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