Srishti Khanda Extracted Page 805

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-805

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Sanskrit Original

Seo श्रीपद्ममहापुरण नरः स्नात्वा तु गंगायां स्वकुलंच समुद्धरेत् । आदरेण यथा स्तौति धनवंतं सदा नरः ॥५०॥ सकृद्वंगां तथास्तुत्वा भवेत्स्वर्गस्य भाजनम्। अश्रद्धयापि गंगायां योऽसौ नामानुकीर्तनम् ॥५ १॥ करोति पुण्यवाहिन्यास्स वै स्वर्गस्य भाजनम्। क्षितौ भावयतो मर्त्यान्नागांस्तारयतेप्यघः ॥५२॥ दिवि तारयते देवान् गंगात्रिपथगास्मृता । ज्ञानतोऽज्ञानतोवापि कामतोऽकामतोपि वा॥५३॥ गंगायां च मृतोमर्त्यः स्वर्ग मोक्षं च विंदति । या गतिर्योगयुक्तस्य सत्वस्थस्य मनीषिणः ॥५४॥ सा गतिस्त्यजतः प्राणान् गंगायां तु शरीरिणः। चांद्रायणसहस्राणि यश्चरेत्कायशोधनम् ॥५५॥ पानं कुर्याद्यथेच्छं च गंगांभः सविशिष्यते। तावत्प्रभावस्तीर्थानां देवानां तु विशेषतः ॥५६॥ तावत्प्रभावो वेदानां यावन्नाप्रोति जाह्नवीम् । तिस्त्रः कोट्योर्धकोटीच तीर्थानां वायुरब्रवीत् ॥५७॥ दिवि भुव्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्तिजाह्ववि। विष्णुपादाब्जसंभूते गंगेत्रिपथगामिनि॥५८॥ धर्मद्रवेति विख्याते पापं मे हर जाह्ववि । विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवीविष्णुपूजिता ॥५ ९॥ त्राहि मामेनसस्तस्मादाजन्मारणांतिकात् । श्रद्धया धर्मसंपूर्णे श्रीमता रजसा च ते ॥६०॥ अमृतेन महादेवि भागीरथि पुनीहि माम् । त्रिभिः श्लोकवरैरेभिर्यः स्नायाज्जाह्ववीजले ॥६ १॥ जन्मकोटिकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । मूलमंत्रं प्रवक्ष्यामि जाह्वव्या हरभाषितम् ॥६२॥ सकृज्जपान्नरः पूतो विष्णुदेहे प्रतिष्ठति । मंत्रश्नायं ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः ॥६ ३॥ है ॥४८॥ और गङ्गा तीर में किए गये पापों का नाश गङ्गा स्नान करने से होता है । अपने जन्म नक्षत्र में अथवा उस दिन को गङ्गा में ॥४९॥ स्नान करके मनुष्य अपने वंश का उद्धार कर देता है । जिसतरह मनुष्य आदर पूर्वक किसी धनी की स्तुति करता है ॥५०॥ उसी प्रकार एक बार भी गङ्गाजी की स्तुति करके मनुष्य स्वर्ग प्राप्ति का पात्र बन जाता है । बिना श्रद्धा के भी जो गङ्गाजी के नामों का कीर्तन करता है ॥५१॥ उसको भी श्रीगङ्गाजी स्वर्ग प्राप्ति का पात्र बना देती है । त्रिपथ गामिनी गङ्गाजी भूमि पर अपने भक्तमानव को तारती हैं, पाताल में नागों को तारती हैं और स्वर्ग में देवताओं को तारती हैं । जान करके जाना चाहकर या नहीं चाहकर भी ॥५२-५३॥ जो मनुष्य गङ्ग तट पर मर जाता है वह स्वर्ग तथा मोक्ष को प्राप्त करता है । योगी सात्त्विक तथा मनीषी मनुष्य को जिस गति की प्राप्ति होती है ॥५४।। उस गति की गङ्गा में प्राण त्याग करने वाले को प्राप्ति हो जाती है । हजारों चान्द्रायण व्रत करने से शरीर जितना शुद्ध होता है ॥५५॥ उससे अधिक शुद्धि गङ्गाजल को इच्छानुसार पीने वाले की होती है । तीर्थो तथा विशेष रूप से देवताओं ॥५६॥ एवं वेदों का तब तक ही प्रभाव रहता है जव तक कि गङ्गाजी की प्राप्ति नहीं होती है । वायु देवता ने कहा द्युलोक, भूलोक तथा अन्तरिक्ष में साढे तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सबके सव हे त्रिपथ गामिनी, विष्णु भगवान् के चरण कमल से उद्धूत जाह्ववि आपके हैं ॥५७-५८॥ हे धर्मद्रवा शब्द से विख्यात जाह्नवि आप मेरे पापों को हर लें । आप भगवान् विष्णु के चरणों से उद्भूत वैष्णवी तथा भगवान् विष्णु से पूजित हैं॥५९।। अतएव आप जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त के पापों से मेरी रक्षा करें । हे श्रद्धा तथा धर्म से परिपूर्ण गङ्ग आप अपने ऐश्वर्य सम्पन्न धूलि से ॥६०॥ तथा जल से हे देवि ! मुझको पवित्र कर दें । इन श्रेष्ठ तीन शलोकों को पढते हुए गङ्गाजी में स्नान करना चाहिए ॥६१॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति अपने करोड़ों जन्मो के पापों से शुद्ध हो जाता है, इसमें किसी प्रकार का संशय नही है ।मैं शङ्करजी के द्वारा कहे गये गङ्गा के मूल मन्त्र को वतलाता हूँ॥६२॥ उसका एक बार जप कर लेने से मनुष्य भगवान् विष्णु के शरीर में प्रतिष्ठित हो जाता है । वह यह मन्त्र है । ॐ

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