Srishti Khanda Extracted Page 802
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-802
Sanskrit Original
संप्राप्रोत्यक्षयं स्वर्ग गंगास्नानेन केशवम् । यशो राज्यं लभेत्पुण्यं स्वर्गमंते परां गतिम् ॥८॥ पितृनुद्दिश्य गंगायां यस्तु पिंडंप्रयच्छति । विधिना वाक्यपूर्वेण तस्य पुण्यफलं श्रृणु ॥९॥ अन्नैकेन तु साहस्रं वर्षपूज्यः सुरालये । तिलेन द्विगुणं विद्धि तथामेध्यफलेन च ॥१०॥ गव्येन विधिना विप्राः स्वर्गस्यांतो न विद्यते । एवं पिंडप्रदानेन नित्यं कतुशतं भवेत् ॥१९॥ पितरोनिरयस्था ये धन्यास्ते मर्त्यवासिनः । धनपुत्रयुतारोग्यं सुखसंमानपूजिताः ॥९२॥ रसातलगता ये च ये च कीटा महीतले। स्थावरे पक्षिसंघादौ तेमर्त्या धनिनो नृपाः ॥१३॥ तत्ततपत्रैश्च॒ पौत्रैश्च ॒ गोत्रै दौहित्रकैस्तथा । जामातृ भागिनेयैश्च॒सुहन्मितरैः प्रियाप्रियैः ॥१४॥ प्रदीयते जलं पिंडं यथोपकरणान्वितम् । गंगातोयेषु तीरेषु तेषां स्वगोंऽ क्षयो भवेत् ॥१५॥ पिंडादूर्ध्व स्थिता ये च पितरो मातृगोत्रजाः । भवंति सुखिनः सर्वे मर्त्याश्शतसहस््रशः ॥१६॥ स्वर्गे तस्य स्थिताः सत्वा अधःस्था मध्यवासिनः । नित्यं वांच्छंति सद्नंगां गच्छन्तु सुरनिम्नगाम् ॥१७॥ एको गच्छति गंगां यः पूयंते तस्य पूरुषाः । एतदेव महापुण्यं तरते तारयत्यपि॥१८॥ गंगाकृत्त्रगुणं वक्तुं नशक्तश्चतुराननः। अतः किंचिद्वदाम्यत्र भागीरथ्या द्विजा गुणम्॥१९॥ मुनयःसिद्धागंधर्वा ये चान्ये सुरसत्तमाः । गंगातीरे तपस्तप्त्वा स्वर्गलोकेऽच्युताभवन्॥२०॥ दिव्येन वपुषा सर्वे कामगेन रथेन च । अद्यापि न निवर्तते रत्मपूर्णक्षयेषु वै॥२९॥ जाते हैं, उसीतरह से गङ्गाजी के जल का स्पर्श होने से पुरुषों के पापों का क्षणभर में ही नाश हो जाता है ॥७॥ गङ्गा में स्नान करने से मनुष्य अक्षय स्वर्ग तथा भगवान् केशव को प्राप्त कर लेता है वह यश, राज्य, स्वर्ग तथा अन्त में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥८॥ जो व्यक्ति पितरों के उद्देश्य से गङ्गा में पिण्डदान विधिपूर्वक शुद्ध वाक्योंच्चारण पूर्वक करता है उसका फल सुनो ॥९॥ जो एक अन्न से पिण्डदान करता है वह एक हजार वर्ष तक देवलोक में पूज्य होता है । तिल के द्वारा अथवा फल से पिण्डदान करने पर उसको दो गुना फल मिलता है ॥१०॥ दूध-दधि आदि गव्यों से पिण्डदान करने पर प्राप्त होने वाले स्वर्ग का कभी अन्त नहीं होता है । इसतरह से पिण्डदान करने पर नित्य ही सौ यज्ञों के करने का फल प्राप्त होता है ॥११॥ उनके पितृगण यदि नरक में भी हो तो धन्य हो जाते है और भूमि पर रहने वाला मनुष्य, धन तथा पुत्र के साथ आरोग्य, सुख तथा सम्मान से पूजित होते हैं ॥१२॥ जो मनुष्य रसातल में चले गये हैं, तथा प्रथिवी पर कीट आदि के रूप में विद्यमान हैं, स्थावर हो गये हों अथवा पक्षि हो गये हों वे भी धनिक राजा होते हैं ॥१३॥ जिनलोगों के पुत्र, पौत्र, गोत्रीयों, दौहित्रो, जामाताओं, भागिनेयों, सुहृदों, मित्रों, पुत्र तथा प्रिय लोग गङ्गा में जाकर उपकरणों के साथ जलदान तथा पिण्डदान करते हैं, उन जीवों को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥१५॥ जो पिता तथा माता के गोत्र वाले पितृगण पिण्ड से ऊपर स्थित हैं वे सभी जीव हजारो गुना अधिक सुखी हो जाते हैं ॥१६॥ उनके सत्त्व तो स्वर्ग में स्थित होते है, चाहे वे नीचे अथवा मध्य में हों, वे सदा यही चाहते हैं कि नित्य ही गङ्गा में जायँ ॥१७॥ जो अकेले गङ्गाजी में जाता है उसके सभी पूर्वज पवित्र हो जाते हैं । इसी महापुण्य से गङ्गा जाने वाले स्वयं तरते हैं और अपने पूर्वजों को भी तार देते हैं ॥१८॥ गङ्गाजी के समस्त गुणों का वर्णन ब्रह्माजी भी नहीं कर सकते हैं । अतएव हे द्विजों ! भागीरथी के कुछ गुणों का मैं वर्णन करता हूँ ॥१९॥ मुनिगण, सिद्धगण तथा गन्धर्व तथा दूसरे श्रेष्ठ देवता गङ्गा के तट पर तपस्या करके स्वर्ग लोक में जाकर स्थिर हो गये ॥२०॥ वे सबके सब दिब्य शरीर तथा कामगरथ के
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