Srishti Khanda Extracted Page 801
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-801
Sanskrit Original
द्वादश्यां जागरे रात्रौ यः पठेत्तुलसीस्तवम् । तीर्थकोटिसहस्रैस्तु यत्फलं लक्षकोटिभिः ॥४२॥ तत्फलं समवाप्नोति पठित्वा तुलसीस्तवम् ॥४३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे तुलसीस्तवमाहात्म्यं नामैकषष्टितमोऽध्यायः ॥६ १॥ ie बासठवो अध्याय द्विजा ऊचुः मज्जनादखिलं पापं क्षयं याति सुनिश्चितम् । महापातकमन्यच्च तदादेशं वदस्व नः ॥९॥ पापात्पूतोऽ क्षयं नाकमश्नुते दिवि शक्रवत् । सुरयोनेर्नहानिः स्यादुपदेशं वदस्व नः ॥२॥ अत्र भोग्यं परं सर्वमृते स्वर्गे सुरोत्तमः । कलिपाप हतानां च स्वर्गसोपानमुच्यते ॥३॥ व्यास उवाच गतिं चिंतयतां विप्रास्तूर्ण सामान्यजन्मनाम् । स्तरीपुंसामीक्षणाद्यस्माद्ंगा पापं व्यपोहति॥४॥ गंगेतिस्मरणादेव क्षयं याति च पातकम् । कीर्तनादति पापानि दर्शनाहुरुकल्मषम् ॥५॥ स्नानात्पानाच्च जाह्नव्यां पितृणां तर्पणात्तथा । महापातकवृन्दानि क्षयं यांति दिने दिने ॥६॥ अग्निनादह्यते तूलं तृणं शुष्कं क्षणाद्यथा । तथा गंगाजलस्पर्शात्पुंसां पापं दहेत्क्षणात्॥७॥ है वह व्याधि राहित जीवन जीता है तथा उसकी अधार्मिक बुद्धि कभी नहीं होती है ॥४ १॥ द्वादशी तिथि को जागरण करके जो रात्रि में तुलसी स्तव का पाठ करता है उसको हजारों करोड़ तीर्थो में स्नान करने का जो फल होता है, उसको तुलसी स्तव के पाठ से प्राप्त होता है ॥४२-४३॥। इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के तुलसीस्तव माहात्म्य नामक एकसठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।६९।। i गङ्कामाहात्म्य तथा गङ्गाजी में स्नान आदि की विधि द्विजों ने कहा-- आप हमलोगों को ऐसे तीर्थ को बतलाएँ जिसमें स्नान करने से निश्चित रूप से महापातकों तथा अतिपातकों का नाश हो जाता है ॥१॥ पाप से पवित्र बना हुआ मनुष्य अक्षय स्वर्ग को इन्द्र के समान प्राप्त करता है और वह देव योनियों में चला जाता है, ऐसे तीर्थ का आप उपदेश करें ॥२॥ इसलोक में स्वर्ग के अतिरिक्त समस्त श्रेष्ठ भोगों को देवताओं को जिससे प्राप्त करता है, जो कलियुगीय पापों से रहितों के लिए स्वर्ग की सीढी के समान हो उसे आप बतलायें ॥३॥ व्यासजी ने कहा-- गङ्गाजी शीघ्र ही गति प्राप्त करना चाहने वाले सामान्य स्री- पुरुषों के पापों को देखने मात्र से दूरकर देती है ॥४॥ गङ्गा का नाम स्मरण करने से पाप का क्षय हो जाता है । गङ्गाजी के नाम का कीर्तन करने से अतिपातकों का नाश हो जाता है तथा गङ्गाजी का दर्शन करने से महान् पाप का नाश होता है ॥५॥ गङ्गा में स्नान करने से, उनका जल पीने से तथा पितरों का तर्पण करने से महापातकों की राशि का प्रतिदिन नाश होता है ॥६॥ जिस तरह अग्नि के सम्पर्क से क्षणभर में ही रुई, तृण तथा दूसरे शुष्क पदार्थ जल
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know