Srishti Khanda Extracted Page 800
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-800
Sanskrit Original
त्रैलोक्यव्यापिनी गंगा यथाशास्त्रेषु गीयते । तथैव तुलसीदेवी दृश्यते सचराचरे॥२८॥ ऋष्यमूके च वसता कपिराजेन सेविता। तुलसी बालिनाशाय तारासंगमहेतवे॥२९॥ प्रणम्य तुलसीं देवीं सागरोत्क्रमणं कृतम्। कृतकार्यः प्रहृष्टश्च हनूमान्पुनरागतः॥ ३ ०॥ तुलसीग्रहणं कृत्वा विमुक्तो याति पातकैः । अथवा मुनिशार्दूल ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥३१॥ तुलसी पत्रगलितं यस्तोयं शिरसा वहेत्। गङ्गास्नानमवाप्रोति दशधेनुफलप्रदम् ॥३ २॥ प्रसीद देवि देवेशि प्रसीद हरिवल्लभे । क्षीरोदमथनोद्धृते तुलसि त्वां नमाम्यहम् ॥३३॥ द्वादश्यां जागरे रात्रौ यः पठेत्तुलसी स्तवम् । द्वात्रिंशदपराधांश्च क्षमते तस्य केशव: ॥३४॥ यत्पापं यौवने बाल्ये कौमारे वारके कृतम् । तत्सर्वं विलयं याति तुलसीस्तवपाठतः ॥३५॥ प्रीतिमायाति देवेशस्तुष्टो लक्ष्मीं प्रयच्छति । कुरुते शत्रुनाशं च सुखं विद्यां प्रयच्छति ॥३६॥ तुलसीनाममात्रेण देवा यच्छति वांछितम्। गरह्माणामपिदेवेशो मुक्तिं यच्छति देहिनाम् ॥३७॥ तुलसी स्तवसंतुष्टा सुखं वृद्धि ददाति च। उद्नतं हेलया विद्धि पापं यमपथेस्थितम् ॥३८॥ यस्मिन् गृहे चलिखितो विद्यते तुलसीस्तवः। नाशुभं विद्यते तस्य शुभमाप्रोति निश्चितम् ॥३९॥ सर्व च मंगलं तस्य नास्ति किंचिदमंगलम्। सुभिक्षं सर्वदा तस्य धनं धान्यं च पुष्कलम् ॥४०॥ निश्चला केशवे भक्तिर्नवियोगश्च वैष्णवैः । जीवति व्याधिनिर्मुक्तो नाधर्मेजायते मतिः॥४९॥ आत्म कल्याण की प्राप्ति के लिए धर्मारण्य गया में पुण्य स्वरूपा आपकी सेवा की थी'॥२६॥ हे तुलसीदेवि ! भगवान् श्रीराम ने दण्डकारण्य में आपको रोपा, लक्ष्मणजी ने आपकी सेवा की तथा सीताजी ने आपकी भक्ति की॥२७॥ जिस तरह त्रैलोक्य व्यापिनी गङ्गाजी शास्त्रो में वर्णित हैं, उसीतरह तुलसी चराचरात्मक जगत् में दिखायी पड़ती है ॥२८॥ ऋष्यमूक पर्वत पर निवास काल में कपिराज सुग्रीव ने बालि का विनाश करने के लिए तथा तारा को प्राप्त करने के लिए आपका सेवन किया ॥२९॥ श्रीहनुमानजी तुलसीदेवी को प्रणाम करके सागर को लांघ गये ओर अपने उद्देश्य में सफल होकर प्रसन्नता पूर्वक लौट आये ॥३०॥ तुलसी को ग्रहण करके जीव पापों से मुक्त हो जाता है अथवा हे मुनि श्रेष्ठ ! वह ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है ॥३१॥ जिसमें तुलसीदल डाला गया हो ऐसे जल को जो अपने शिर पर धारण करता है, उसको गङ्गाजी में स्नान करने तथा दश गायों का दान करने का फल प्राप्त होता है ॥३२॥ हे तुलसी देवि ! आप प्रसन्न होइये, हे हरि बल्लभे ! आप प्रसन्न हों । हे क्षीरसागर के मंन्थन से उत्पन्न होने वाली आप प्रसन्न होइये आपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥३३॥ द्वादशी तिथि को जागरण करके जो तुलसी स्तोत्र का पाठ करता है, उसके बत्तीस अपराधों को भगवान् केशव क्षमा कर देते 'हैं।।३४।।-जवानी;:बचपन, कुमारावस्था तथा वृद्धावस्था में जो पाप हो जाते हैं, वे सभी तुलसी स्तव का पाठ करने से विनष्ट हो जाते है ॥।३६॥ श्रीभगवान् प्रसन्न होकर उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं उसके शत्रु का नाश करके सुख तथा ज्ञान प्रदान करते हैं ॥३६॥ तुलसी का केवल नाम लेने से देवगण उसके मनोभिलषित पदार्थो को प्रदान करते हैं, निन्दित जीवों को” भी श्रीभगवान् मुक्ति प्रदान कर देते हैं ॥३७॥। स्तोत्र पाठ से संतुष्ट होकर तुलसीःदेवी सुख तथा वृद्धि प्रदान करती हैं तथा कुमार्ग स्थित व्यक्ति के उत्पन्न पापों को विनष्ट कर देती हैं ॥३८॥ जिसके घर में लिखित रूप से तुलसी स्तव रहता है, उसका कभी अकल्याण नहीं होता है और उसको शुभ कीःप्राप्ति होती हैं ॥३९॥ उस घर में: सबकुछ मङ्गलमय ही रहता है अमङ्गलमय कुछ भी नहीं रहता उसके यहाँ हमेशा 'सुभिक्ष' बना रहता है और पुष्कल मात्रा' में धन-धान्य की प्राप्ति होती है ॥४०॥ भगवान् विष्णु में निश्चला भक्ति होती है श्रीवैष्णवों 'का' कभी वियोग' नहीं होता
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