Srishti Khanda Extracted Page 797
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-797
Sanskrit Original
. श्रोपद्ममहापुराण दुष्कृतौधाददिनिर्भुक्त: स्वर्गमेति निरामयम् । राजसूयादिभियज्ञित्नतिश्ष॒ विविधै यमैः ॥१३३॥ या गतिः प्राप्यते घीरैः तुलसीसेविनां भवेत् । तुलसीदलेन चैकेन पूजयित्वा हरिं नरः ॥१३४॥ वैष्णवत्वमवाप्रोति किमऱ्यैः शास्त्रविस्तरैः । न पिबेत्स पयोमातुस्तुलस्याः कोटिसंख्यकैः ॥१३५॥ अर्चितः केशवो येन शाखामृदुलपल्लवैः । भावयेत्पुरुषान्मर्त्यः शतशोऽथ सहस्रशः॥१३६॥ पूजयित्वा हरिं नित्यं कोमलैस्तुलसीदलैः । प्रधानतो गुणास्तात तुलस्या गदिता मया ॥१३७॥ निखिलं पुरुकालेन गुणं वक्तं न शक्कुमः । यस्त्विदं शृणुयान्नित्यमाख्यानं पुण्यसंचयम्॥१३८॥ पूर्वजन्मकृतात्पापान्मुच्यते जन्मबंधनात् । सकृत्पठनमात्रेण वह्विष्टोमफलं लभेत् ॥१३९॥ न तस्य व्याधयः पुत्र मूर्खत्वं न कदाचन । सर्वदा जयमाप्रोति नगच्छेत्स पराजयम्॥१४०॥ लेखस्तिष्ठेहुहे यस्य तस्य लक्ष्मी: प्रवर्तते। नचाधयो न च प्रेता न शोका नावमानना ॥१९४१॥ नतिष्ठंति क्षणं तत्र यत्रेयं वर्तते लिपिः ॥१४२॥ इति श्रोप्वमहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे तुलसीमाहात्म्यं नाम षष्ठितमोऽध्यायः ॥६ ०॥ ——— ee जिसने तुलसी को सेवा की है, उसने गुरु, ब्राह्मण, देवता, तीर्थ, सबों को सेवा ळर लो । जो व्यक्ति में तुलसी धारण करके प्राणों का परित्याग करता है ॥१३१-१३२॥ वह सभी पापो से मुक्त होकर स्वर जाता है । राजसूय यज्ञों, ब्रतों तथा अनेक प्रकार के संयमों ॥६३३॥ के द्वारा दिस गति चे शाप्त पूजा करने वाला मनुष्य अपने सैकड़ों हजारों पूर्वजों खो सन्तुष्ट कर देता है । हे तात ! मैने तुलस्े के अष्ट्न रुपयों क्यो बतला दिवा ॥१३६-१३७॥ तुलसी के समस्त गुणों ख वर्णन बहुत समय में झो नहो फिदा जा सूक है । जे व्यक्ति पुण्य समूह रूप इस पवित्र आख्यान व्हे नित्य ऋवण करता है ॥१३८॥ दह पूर्व जन्मे में किए शदे पणे ठ जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है । इसका एकबार भी पाठ करने से अग्निष्टोम याग का फूल आप्त हेला हे॥१३९॥ हे पुत्र ! उस व्यक्ति को न तो कई रोग होता है और न ऊभी मूर्खता होत्मे है । दह सवज विजये हेत हे, उसको पराजय कभी भी नहीं होती है ॥१४०॥ जिसके घर में इस ऊथा खा सेख रहत्व हे उसो सखे दो बुद्ध होती हे । उसके सारे रोग, प्रेतबाघा, शोक तथा अपमान दिनष्ठ ह्ये जाते हे ॥१४२॥ दे सब व्व्हो नहे रहते है जहाँ पर यह अन्य रहता है ॥१४२॥ इस तरह ् जीपद़महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के तुलसी माहात्म्य वर्णन नामक स्शठवे अध्याय ङा शिवप्रसाद द्विवेदी (औधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ६ ७।। के
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