Srishti Khanda Extracted Page 795

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-795

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Sanskrit Original

Se श्रीपद्ममहापुरण स्कंद उवाच महीरुहफलं ज्ञातं प्रपूतं द्विविधं प्रभो। इदानीं श्रोतुच्छिमि पत्रं पुण्यं सुमोक्षदम्॥१०४॥ ईश्वर उवाच सर्वेभ्यः पत्रपुष्पेभ्यः सत्तमा तुलसी शिवा । सर्वकामप्रदा शुद्धा वैष्णवी विष्णुसुप्रिया ॥१०५॥ भुक्तिमुक्तिप्रदामुख्या ` सर्वलोकपरा शुभा । यामाश्रित्य गताः स्वर्गमक्षयं मुनिसत्तमाः ॥१०६॥ हितार्थ सर्वलोकानां विष्णुनारोपिताः पुरा।-तुलसीपत्रपुष्पं च सर्वधर्मप्रतिष्ठितम्॥१०७॥ यथा विष्णोः प्रिया लक्ष्मी यथाहं प्रिय एव च ॥- तथेयं": तुलसी: . देवी चतुर्थो नोपपद्यते॥१०८॥ तुलसीपत्रमेकं तु > शतहेमफलप्रदम्-नान्यैः” ।पुष्पैस्तथापत्रैः ८ नन्यैर्गधानुलेपनैः ॥१०९॥ तुष्यते दैत्यहा ` विष्णुस्तुलस्याश्च दलैर्विना। अनेनो” पूजितो!'येनः हरिर्नित्यं पराशया ॥१९०॥ तेन ` दत्तं ' हुतं ज्ञातं कृतः यज्ञव्रतादिकम्ःः जन्मजन्मनिःभासित्वा सुखं {भाग्यं यशः: श्रियम् १ ९९॥ कुलं शीलं कलत्रं च पुत्रं दुहितरं तथा धनः” राज्यमरोगत्वंः ज्ञानं £ विज्ञानमेवञच१:१-२॥ वेदवेदांगशास्त्रं चः 'पुराणागमसंहिताःपः सर्वः” करगतं: 7 मन्ये तुलस्या भ्यर्चनें ' हरेः ॥ १-९ इमी यथा, - गङ्गापवित्रांगी ' -सुरलोके विमोक्षदा?>यथा77ःभागीरथीपुण्या > तथैक]तुलसीशिवाऽ॥ ९२४ किच ८ गंगाजलेनैव किचापुष्करसेवया]'तुलसीदलमिश्रेण "जलेनैव" 'प्रमोद्यते7ी १९५ माधवः 'संमुखो 'यस्य जन्मजन्मंसु-घीमतः तस्य 'श्रद्धाभवेछुत्वा तुलस्या’ हरिमर्चितुम्॥१ ९६ मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजित होता है।॥ १ ०२॥ विशेष रूप से'इसेः वैष्णवों को'सुनना:चाहिए, 'वहं' मनुष्य भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है; इसतरह से पौराणिको का कहना हैः ॥१ ०३॥ स्कन्दंजीं ने हे प्रभो? मैने वृक्षों के दो अत्यन्त पवित्र फलों को जान लियाअब मैं मोक्ष प्रद पत्रों औरपुष्पों को जानना 'चाहता हुँ।। १० दी ईश्वर ने कंहा--5 सभी पत्रों तेथा पुष्पों से तुलसी सर्वश्रेष्ठ कल्याणप्रद है-।" वह सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली; शुद्ध, वैष्णवी तथा भगवार्न्विष्णु'को प्रिय है ॥१०५॥ सभी लोकों में सर्वाधिक कल्याणप्रद भोगःतथा मोक्ष को प्रदानःकरने -वाली-है ।। उसी' को अपनाकर श्रेष्ठः मुनिगण अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर लिए श«६॥ सम्पूर्ण -लोकों'को कल्यार्ण करने के'लिए इसे सर्वप्रथम विष्णु'मगवान्-ने'रोपा!।तुलसी"के प्त्र/त्तथा पुष्प'सभी'धर्मो' में प्रतिष्ठित हैं॥१०७॥जिसतरह भगवान् विष्णु कोःलक्ष्मीजी प्रियःहैतथा मैं प्रिय हूँ; उसीतरह- से तुलसीदेवी श्रीभेगवान्कोप्रिय हैं । चौथा कोई भी-उतेना प्रिय नहीं 'है।। १०८ातुलेसी का एक 'पत्ता-सौ सुवर्ण मुंद्रा का' फल-अदान करने वाला है। उस'तरहं-का'फल' दूसरे पुष्पो पत्रो तथा चन्दन इत्यादिःसे 'महीं होता है॥।१०९॥।-तुलसीदलं के बिना दैत्यहन्ता भगवान्ःविषगु प्रसत्र7नहीं होतेहे जोःव्यक्ति परम 'आशा'सेःतुलसीदला के ' द्वारः जो भगवान् विष्णु की पूजा करता है?॥। ११०? उसमे दान, होम, ज्ञान; यज्ञ) ब्रेल, प्रत्येक "ज्म में होनेरचाले'सुखे; भाग्य; यशः औरतत्री॥ रर कुलं, शील; पत्नी; सुत्र; पुत्री थत्र, राज्यः अरोग्य ज्ञान विज्ञान १ € रँ। विद वेदाङ्ग शास्त्रा पुरण; आगम और म्रंहिताएँ संब-कुँछ।तुलसी।की अर्चना" से मानो प्राप्त कर'लिया। १३।।। जिसतरह पवित्र अंगों वाली गङ्गां, देवलोक में मोक्षः प्रदानः करती है; वह” भागीरंथी'श्रीभगर्वान्- को ' जितना प्रिंग्र है;उतना हीते कल्याणकारी-तुलेसी तुलसी भी परियः है ॥।११४॥ गाङ्गा'का-जलः तथा पपुष्करःकी-सेवाः करमे।कीः अपेक्षां'मगवान् विष्णुः तुलसी मिश्रित जल से हीः सत्र होते हैं ॥१।१५॥जिस]बुद्धिसान के प्रति प्रत्येक जन्म मेंप्भगेवान्'विष्णुः प्रसन्न "होतो हैं; उसी'को' इस असरको सुनकर तुलसी7से भगवात्त की अर्चना करगे में 'श्रद्धा"होती।है ॥१९६॥ जो!तुलसी"की मंजरी त्तया" दलो कें द्वारा

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