Srishti Khanda Extracted Page 794

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-794

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Sanskrit Original

स्त्रियो यैश्च न रक्ष्य ते ते प्रेता नात्र संशयः । क्षुधा संतप्तदेहं तु श्रांत विप्रं गृहागतम् ॥८ ९॥ गुणपुण्यातिथिं त्यक्त्वा पिशाचत्वं ब्रजंति ते । विक्रीणंति च वै गाश्च म्लेच्छेषु च गवाशिषु ॥९०॥ प्रेतलोके सुखं स्थित्वा ते च यांत्यपुनर्भवम् । अशौचाभ्यंतरे ये च जाताश्च पशवो मृताः॥९९॥ चिरं प्रेताः पिशाचाश्च मृता जाताः पुनः पुनः । जातकर्ममुखैश्चैव संस्कारैये विवर्जिताः ॥९२॥ एकैकस्मिश्च संस्कारे प्रेतत्वं परिहीयते । स्नानसंध्यासुरार्चाभि वेदयज्ञब्रताक्षरैः ॥९३॥ आजन्मवर्जिताः पापास्ते प्रेताश्चापुनर्भवाः । भोजनोच्छिष्टपात्राण यानि देहमलानि च ॥९४॥ निपातयंति ये तीर्थे ते प्रेता नात्र संशयः । दानमानार्चनै्नैव यै र्विप्रा भुवि तर्पिताः ॥९५॥ पितरो गुरवश्चैव प्रेतास्ते कर्मजा भृशम् । पतिं त्यक्त्वा च या नार्यो वसंति चेतरैर्जनैः ॥९६॥ प्रेतलोके चिरं स्थित्वा जायंते चांत्ययोनिषु । पतिं च वंचयित्वा या विषयेंद्रियमोहिताः ॥९७॥ मिष्टं चादंति याः पापास्तास्तु प्रेताश्चिरं भुवि। विण्मूत्रभक्षका ये च ब्रह्मस्वभक्षणे रताः॥९८॥ अभक्ष्यभक्षकाश्चान्ये ते प्रेताश्चापुनर्भवाः । बलाद्ये परवस्तूनि गृह्णति न ददत्यति॥९९॥ अतिथीनवमन्यंते प्रेता निरयमास्थिताः । तस्मादामलकीं भुक्त्वा स्नात्वा तस्य द्रवेण च॥१९० ०॥ सर्वपापाद्विनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन सेवयामलकी शिवाम् ॥१०९॥ य इदं शृणुयान्नित्यं पुण्याख्यानमिदं शुभम् । सर्वपापप्रपूतात्मा विष्णुलोके महीयते ॥१०२॥ श्रावयेत्सततं लोके वैष्णवेषु विशेषतः। स याति विष्णुसायुज्यमिति पौराणिका विदु:॥९ ० ३॥ तथा म्लेच्छो से जीविका प्राप्त करने वाले, म्लेच्छों का अनुगमन करने वाले, स्री के धन से ही अपनी जीविका चलाने वाले ॥८८॥ तथा अपनी स्त्री की रक्षा नहीं करने वाले निश्चित रूप से मरकर प्रेत होते हैं । भूख से व्याकुल घर पर आये हुए ब्राह्मण अतिथि को भोजनादि न कराकर लौटा देने वाले मर कर पिशाच होते हैं । जो लोग गौ खाने वाले म्लेच्छों को गौ बेच देते हैं ॥९०॥ वे प्रेतलोक में बहुत दिनों तक रहकर फिर कभी मनुष्य योनि में जन्म नहीं प्राप्त करते हैं जो पशु अशौच के भीतर ही जन्म लेकर मर जाते हैं ॥९१॥ वे बहुत समय तक प्रेत और पिशाच होकर मरते और उत्पन्न होते रहते हें । जो जातकर्म आदि संस्कारों से रहित ॥९२॥ एक-एक संस्कार के द्वारा प्रेतत्व का नाश होता है । स्नान, संध्या, देवार्चन, वेदाध्ययन, यज्ञ तथा व्रत से प्रेतत्व का नाश होता है॥९३॥ जन्म से ही रहित पापी पुरुष मरकर प्रेत होते हैं और उन्हें मनुष्य का जन्म नहीं मिलता है । जो लोग भोजन के उच्छिष्ट पात्र तथा देह के मैल को तीर्थ में फेंक देते हैं, वे भी निश्चित रूप से प्रेत होते हैं । जिनलोगों ने भूलोक में दान, सम्मान तथा पूजन के द्वारा ब्राह्मणों, पितरों तथा गुरुजनों को तृप्त नहीं किया है ॥९५॥ ऐसे भी जीव मरकर कर्मज प्रेत होते हैं जो नारियाँ अपने पति को छोड़कर दूसरे लोगों के साथ रहती है ॥९६॥ वे दीर्घकाल तक ् रेतलोक में रहकर अन्त में शूद्र योनि में जन्म लेती हैं विषयों तथा इन्द्रियों से मोहित होकर जो स्त्रिया पति को धोखा देकर अकेले मीठे पदार्थे को खाती हैं वे भूलोक में दीर्घकाल तक प्रेत रहती है जो ब्रह्मस्वरूप को खा लेते हैं वे विष्ठा और मूत्र को खाते हैं ॥९८॥ दूसरे अभक्ष्य भक्षण करने वाले प्रेत होकर पुनः मनुष्य योनि में जन्म नहीं लेते हैं । जो लोग बलपूर्वक दूसरों की वस्तु को लेकर उसे नहीं लौटाते हैं ॥९९॥ अतिथियों का अपमान करते हैं वे मरकर प्रेत होते हैं और नरक में निवास करते हैं । इसलिए आँवला के फल को खाकर तथा उसके रस से स्नान करके ॥१००॥ मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में पूजित होता है । अतएव समस्त प्रयत्नो के द्वारा आँवलें का सेवन करो, वह कल्याणकारी है ॥१०१॥ जो व्यक्ति इस पवित्र आख्यान को सुनता है वह सभी पापों से

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