Srishti Khanda Extracted Page 793
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-793
Sanskrit Original
ईश्वर उवाच पूर्व ते ज्ञानलोपाच्च न जानंति हिताहितम्। उच्छिष्टं श्वभिरुत्स्पृष्ट श्लेष्ममूत्रंशकृत्तुवा॥७४॥ मत्वा च मोहिताः श्रेष्ठं प्रेतादंतिसदैव हि । शकृच्छौचजलं वांतं बलिसूकरकुक्कुटैः ॥७५॥ मृतके सूतकेजप्यं नत्यक्तं येन केनचित् । तस्यान्नं च जलं प्रेताः खादंति तु सदैव हि॥७६॥ दुर्दाता गृहीणी यस्य शुचिसंयमवर्जिता। गुरु निःसारिता दुष्टा संति प्रेताश्च तत्र वै ॥७७॥ अपुङ्गवा कुलैर्जाया बलोत्साहविवर्जिताः। बधिराश्च कृशा दीनाः पिशाचाः कर्मजातयः ॥७८॥ क्षणं च मंगलं नास्ति दुःखैर्देहयुता भृशम्। तेनैव विकृताकाराः सर्वभोगविवर्जिताः ॥७९॥ नग्नका रोगसंतप्ता मृता रूक्षा मलीमसा: । एते चान्ये च दुःखार्ताः सदैव प्रेतजातयः ॥८ ०॥ तेन कर्मविपाकेन जायंते काममीदूशाः । पितृमातृगुरूणां च देवनिंदापराश्च ये ॥८९॥ पाषंडा: कौलिकाः पापास्ते प्रेताः कर्मजा भुवि । गलपाशैर्जलैः शख्नैर्गर लैरात्मघातकाः ॥८ २॥ इह लोके च ते प्रेताश्चांडालादिषु संभवाः। अंत्यजाः पतिताश्चैव पापरोगमृताश्च ये ॥८३॥ अंत्यजै घातिता युद्धे ते प्रेता निश्चिता भुवि । महापातकसंयुक्ता विवाहे च बहिष्कृताः ॥८ ४॥ शौर्यात्साहसिका ये चते प्रेताः कर्मजा भुवि। राजद्रोहकरा ये च पितृणां द्रोहचिंतकाः ॥८५॥ ध्यानाध्ययनहीनाश्च ब्रतर्देवार्चनादिभिः । अमंत्राः स्नानहीनाश्च॒ गुरुस्त्रीगमने रताः ॥८६॥ तथैव चांत्यजस्त्रीषु दुर्गतासु च संगताः । मृताः क्रूरोपवासेन म्लेच्छदेशस्थिता मृताः ॥८७॥ म्लेच्छभाषायुता शुद्धास्तथा म्लेच्छोपजीविनः । अनुवर्तति ये म्लेच्छान् स्त्रीधनैरूपजीवकाः ॥८८॥ नहीं रहने के कारण अपने हित तथा अहित को नहीं जानते हैं । वे उच्छिष्ट, कुत्तों से स्पृष्ट, कफ, मूत्र तथा विष्ठा समझकर मोहित हो जाते हैं और श्रेष्ठ आँवले को नहीं खाते हैं, उनके द्वारा दिए गये वस्तु को सदा प्रेत ही खाते है। शौच से बचे हुए जल, वमन, बलि सूकर तथा मूर्गो के द्वारा ॥७४॥ मृतक शौच में जप करने वालों के द्वारा दिए गये अन्न जल को सदा प्रेत ही खाते हैं ॥७५-७६॥ जिसकी पत्मीवश में नहीं रहती है वह अपवित्र तथा संयम रहित होती है, जिसको उसके गुरुजन घर से निकाल दिए हों तथा दुष्टा स्बरियाँ जहाँ रहती हैं, वहाँ प्रेत रहते है ॥७७॥ कायर जाति, वंश बल तथा उत्साह से रहित, बहरे, दुर्बल और दीन ये सभी कर्मज पिशाच हें ॥७८॥ उन सबों को शरीर से क्षणभर भी सुख नहीं मिलता हे, वे अत्यन्त दुःखी होते हैं, इसीलिए उनका (पिशाचों का) आकार विकृत हो जाता है तथा वे सभी प्रकार के भोगों से रहित होते हैं ॥७९॥ ये सभी प्रेतां की जातियाँ, रोगी, रुक्ष तथा मैली होती हैं तथा दुःखों से दुःखी रहती हें ॥८०॥ वे अपने पूर्वकमों के परिणाम स्वरूप ऐसे हो जाते हें । जो मनुष्य माता-पिता गुरु तथा देवताओं की निन्दा करते हैं ॥८ १॥ पाखण्डी तथा कोलिक है, वे पापी पृथिवी पर कर्मज प्रेत होते हैं। गले में फाँसी लगाकर, जल में डूबकर, शस्त्र से तथा त्षि खाकर जो लोग अपनी हत्या कर लेते हैं ॥८२॥ वे इस लोक में ही प्रेत होते हैं । चाण्डाल, योनि में उत्पन्न होने वाले, अन्त्यज, पतित तथा पाप एवं रोग से मरने वाले॥८३॥ तथा युद्ध में शूद्रो द्वारा मारे गये लोग पृथिव पर निश्चित रूप से प्रेत होते हैं जो महापातकी हैं, जिनका कोई विवाह नहीं करता है ॥८४॥ जो साहसिक पराक्रम दिखाने वाले हैं वे पृथिवी पर कर्मजन्य प्रेत होते हैं । राजद्रोह करने वाले तथा माता-पिता से द्रोह करने वाले ॥८५॥ ध्यान, अध्ययन, ब्रत तथा देवार्चन से रहित, मन्त्रहीन, स्नानहीन, गुरु की पत्नी से संगम करने वाले ॥८६। उसी तरह शूद्रों की खिियों तथा कुलटाओं के साथ संगम करने वाले, क्रूर उपवास करके मरने वाले, म्लेच्छों के देश में रहकर मरने वाले ॥८७॥। म्लेच्छों की भाषा बोलने वाले,
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