Srishti Khanda Extracted Page 792
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-792
Sanskrit Original
पाठयित्वा पठित्वा च पिशाचत्वं न गच्छति । व्रतैश्च विविधैः पूताः पद्याक्षथारणैस्तथा ॥६३॥ जप्त्वा पद्याक्षमालायां प्रेतत्वं नैव गच्छति । धात्रीफलद्रवैः स्तात्वा नित्यं तद्वक्षणे रताः ॥६४॥ तेन विष्णुं सुसंपूज्य न गछति पिशाचताम्। प्रेता ऊचुः सतां संदर्शनात्पुण्यमिति पौराणिका विदुः ॥६५॥ तस्माद्वो दर्शनं जातं हितं नः कर्तुमर्हथ । प्रेतभावाद्यथा मुक्तिः सर्वेषां नो भविष्यति ॥६६॥ ब्रतोपदेशकं धीरा युष्माकं शरणागताः। ततो दयालवः सर्वे तानूचुद्विजसत्तमा: ॥६७॥ धात्रीणां भक्षणं शीघ्रं कुर्वतां मुक्तिहेतवे। प्रेता ऊचुः धात्रीणां दर्शने विप्रा वयं स्थातुं न शक्रुमः ॥६८॥ कथं तेषां फलानां च शक्ता वै भक्षणेधुना । द्विजा ऊचुः अस्माकं वचनेनात्र धात्रीणां भक्षणं शिवम् ॥६९॥ फलिष्यति परं लोकं तस्माद्गन्तुं समर्हथ । अथ तेभ्यो वरं लब्ध्वा धात्रीवृक्षं पिशाचकैः ॥७०॥ समारुह्य फलं प्राप्य भक्षितं लीलया तदा। ततो देवालयात्तूर्ण रथं पीनं सुशोभनम् ॥७१॥ आगतं तं समारुह्य सचांडालपिशाचकाः । गतास्ते त्रिदिवं पुत्र व्रतैर्यज्ञैः सुदुर्लभम् ॥७२॥ स्कंद उवाच धात्रीभक्षणमात्रेण पुण्यं लब्ध्वा दिवं गताः। तद्धक्षिणः कथं स्वर्गं न गच्छंति नरादयः ॥७३॥ जो पूजन करते हैं वे प्रेत नहीं होते हैं । पौराणिक दिव्य धार्मिक वाक्यों का श्रवण करके ॥६२॥ उनको पढकर अथवा पढवाकर मनुष्य प्रेतत्व को नहीं प्राप्त करते हैं अनेक ब्रतों को करने से पवित्र हुए तथा कमल की माला को पहनने वाले ॥६३॥ तथा कमल की माला पर जप करने वाले प्रेत नहीं होते हैं ।आवला के फल के रस से स्नान करके तथा उनका भक्षण करके ॥६४॥ आँवले के फल से भगवान् विष्णु की पूजा करके जीव पिशाचत्व को नहीं प्राप्त करते हैं प्रेतों ने कहा-- पौराणिकों का कहना है कि सत्पुरुषों के दर्शन से पुण्य होता है ॥६५॥ अतएव आपलोगों का दर्शन हमलोगों को मिला है, आपलोग हमलोगों का कल्याण करें, जिससे कि हमसबों की प्रेतत्व से मुक्ति मिल जाय ॥६६॥ पुरुषां आपलोग हमें ब्रत का उपदेश करें, हम आपके शरण में हैं उसके बाद दयालु उन ब्राह्मणों नेकहा ॥६७॥ तुमलोग मुक्ति ग्राप्त करने के लिए शीघ्र आँवले के फल को खा लो प्रेतों ने कहा-- हे ब्राह्मणों आँवले का दर्शन करने में हमलोग समर्थ नहीं हैं तो फिर उन सबों के फलों को कैसे खा सकते हैं ? ब्राह्मणों नेकहा-- हमलोगों के कहने मात्र से आँवले के फल को खाना तुम्हारे लिए कल्याणाकरी है ॥६९॥ उससे तुमलोगों को स्वर्ग प्राप्त हो जायेगा । उसके बाद ऋषियों का वरदान प्राप्त करके वे पिशाच आँवले के पेड़ पर॥७०॥ चढकर तथा फल को प्राप्त करके अपने मनोनुकूल खाये । उसके बाद देवलोक से शीघ्र ही सुन्दर तथा बड़ा रथ आया ॥७१॥ वे सभी पिशाच तथा चाण्डाल उस पर बैठकर, हे पुत्र ! वे सब दुर्लभ स्वर्गलोक चले गये।७२॥ स्कन्दजी ने कहा-- आँवले का फल खाने मात्र से पुण्य प्राप्त करके वे सब स्वर्ग लोक चले गये तो फिर आँवले का फल खाने वाले दूसरे मनुष्य स्वर्ग क्यों नहीं जाते हैं ?॥७३॥ ईश्वर नेकहा-- वे सब पहले से ज्ञान
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