Srishti Khanda Extracted Page 791

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-791

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Sanskrit Original

श्रीपष्ममहापुराण श्रोतुच्छामहे सम्यक्कथं वै विकृतं वपुः । द्विजा ऊचुः शीतवातातपक्लेशैः क्षुत्पिपासाविशेषकः ॥५९॥ अन्यैरपि च दुःखैयें पीडिताः कूटसाक्षिणः । बधवंधप्रमीताश्च प्रेतास्तेनिरयं गता: ॥५२॥ छिद्रान्वेषपरा ये च द्विजानां कर्मघातिनः। तथैव च गुरूणां च ते प्रेताश्चापुनर्भवाः ॥५३॥ दीयमाने द्विजाम्र्ये तु दातारं प्रतिविध्यति। चिरं प्रेतत्वमाश्रित्य नरकान्ननिवर्तते ॥५४॥ परस्य वाऽत्मनो वा गां कृत्वा पीडनवाहने । न पालयन्ति ये मूढास्ते प्रेताः कर्मजा भुवि ॥५५॥ हीनप्रतिज्ञकाः सत्यास्तथा भम्नब्रतानराः । नलिनीदलभुक्ताश्च ते प्रेताः कर्मजा भुवि॥५६॥ विक्रीणन्ति सुतां शुद्धां स्ब्रियं साध्वीमकंटकाम् । पितृव्यमातुलादेश्च॒ते प्रेताः कर्मजा भुवि॥५७॥ एते चान्ये च बहवः प्रेता जाताः स्वकर्मभिः । प्रेता ऊचुः न भवंति कथ प्रेता: कर्मणा केन वा द्विजाः ॥५८॥ हिताय वद नस्तूर्ण सर्वलोकहितं परम् । द्विजा ऊचुः येन चैव कृतं स्नानं जले तीर्थस्य धीमता ॥५९॥ नमस्कृतं परं लिंगं न प्रेतो जायते नरः । एकादश्यामुपोष्यैव द्वादश्यां च विशेषतः ॥६०॥ पूजयित्वा हरि मर्त्याः प्रेतत्वं न ब्रजति वै । वेदाक्षरप्रसूक्तै श्च स्तोत्रमंत्रादिभिस्तथा ॥६ १॥ देवानां पूजने रक्ता न वै प्रेता भवंति ते। श्रुत्वा पौराणिकं वाक्यं दिव्यं च धर्मसंहितम् ॥६२॥ मनुष्य प्रेत योनि में चले जाते हैं ॥४९-५०॥ हमलोग यह जानना चाहते हैं कि हमलोगों का रूप विकृत क्यों हो जाता है ? ब्राह्मणों ने कहा-- शीत, वायु तथा आतप के क्लेश से तथा भूख प्यास के कारण ॥५१॥ दूसरे भी दुःखों से, जो झूठी गवाही देने वाले पीडित होते हैं, जो निरन्तर वध करने तथा बाँधने के ही काम में लगे रहते हैं, ऐसे मनुष्य मरकर प्रेत होते हैं और नरक में जाते हैं ॥५२॥ जो घिद्रान्वेषण करने वाले होते हैं, तथा ब्राह्मणों के कर्मा का घात करने वाले होते हैं, तथा जो अपने गुरुजनों के साथ घात करने वाले होते हैं वे प्रेत होकर फिर मनुष्य योनि में जन्म नहीं पाते हें ॥५३॥ जो लोग ब्राह्मणों को दान करने वालों को बाधित करते हैं, वे दीर्घकाल तक प्रेतत्व को प्राप्त करके फिर नरक में चले जाते हैं और वहाँ से निकल नहीं पाते हैं ॥५४।। दूसरे अथवा अपने गौ(बैल) को बहुत अधिक जोतकर जो उन सबों का ठीक से पालन नहीं करते हैं, वे मूर्ख मर कर प्रेत होते हैं ॥५५॥ झूठी प्रतिज्ञा करने वाले तथा व्रत को भंग करने वाले, कमल के पत्ते में भोजन करने वाले, वे इस भूलोक में कर्मज प्रेत होते हैं ॥५६। जो लोग अपनी पुत्री को बेचते हैं, शुद्ध एवं साध्वी खी को, निर्दोष स्री को, चाची और मामी को बेच देते हैं ऐसे लोग मर कर प्रेत होते हैं ॥५७॥ ये सभी तथा बहुत से दूसरे भी मनुष्य अपने कर्मो के कारण प्रेत होते हैं प्रेतों ने कहा-- हे द्विजों किन कर्मो को करने से लोग प्रेत नहीं होते हैं ॥५८॥ इस बात को आपलोग हमलोगों को तथा संसार के कल्याण के लिए शीघ्र बतलायें ब्राह्मणों ने कहा-- जो बुद्धिमान पुरुष तीर्थ जल से स्नान करते हैं ॥५९॥ तथा परमात्मा को नमस्कार करते हैं वे प्रेत नहीं होते हैं । एकादशी अथवा द्वादशी को उपवास करके ॥६०॥ तथा श्रीहरि की पूजा करने वाले मनुष्य प्रेत नहीं होते हैं, वैदिक सूक्तों तथा मन्त्रों से ॥६१॥

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