Srishti Khanda Extracted Page 789
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-789
Sanskrit Original
जद ४ श्रीपदामहापुराण तस्माद्रविदिने तात सप्तम्यां च विशेषतः। धात्रीफलानि सततं दूरतः परिवर्जयेत् ॥२४॥ यस्तु स्नाति तथा शनाति धात्री च रविवासरे । आयुर्वित्तं कलत्रं च सर्व तस्य विनश्यति॥२५॥ संक्रान्तौ च भृगोवरि षष्ठ्यां प्रतिपदि भ्रुवम् । नवम्यां चाप्यमायां च धात्री दूरात्परित्यजेत्॥२६॥ नासिका कर्णतुंडेषु मृतस्य चिकुरेषु वा । तिष्ठेद्धात्रीफलं यस्य स याति विष्णुमंदिरम् ॥२७॥ धात्रीसंपर्कमात्रेण मृतो यात्यच्युतालयम् । सर्वपापक्षयस्तस्य स्वर्ग याति रथेन तु ॥२८॥ धात्रीद्रवं नरो लिप्तूवा यस्तुस्नानं समाचरेत्। पदे पदेश्वमेधस्य फलं प्राप्रोति धार्मिकः ॥२९॥ अस्य दर्शनमात्रेण ये वै पापिष्ठजंतवः । सर्वे ते प्रपलायंते ग्रहादुष्टाश्च दारुणाः ॥३०॥ पुरैकः पुल्कसः स्कंदमृगयार्थं वन गत: । मृगपक्षिगणान् हत्वा तृषया परिपीडितः ॥३९॥ क्षुधयामलकीवृक्षं पुनःपीनफलान्वितम् । दृष्ट्वा संरुह्य सहसा चखाद फलमुत्तमम् ॥३२॥ ततो दैवात्सवृक्षाग्रान्निपपात महीतले। वेदना गाढसंविद्धः पंचत्वमगमत्तदा ॥३३॥ ततः प्रेतगणाः सर्वे रक्षोभूतगणास्तथा। तनुं वोढुं मुदा सर्वे येवै शमनसेवकाः॥३४॥ नशक्कुवंति चांडालं मृतं द्रष्टुं महाबलाः । अन्योन्यं विग्रहस्तेषां ममायमिति भाषताम् ॥३५॥ ग्रहीतुं चापि नेतुं च न शक्तास्ते परस्परम् । ततस्ते तु समालोक्य गता मुनिगणान्प्रति ॥३६॥ प्रेता ऊचुः किमर्थ मुनयो धीराश्चांडालं पापकारिणम्। प्रेक्षितुं न वयं शक्ता न चापि यमसेवकाः॥३७॥ की पूजा में वह प्रशस्त है ॥२३॥ इसीलिए हे तात ! रविवार तथा सप्तमी तिथि को आंवले का दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए ॥२४॥ जो रविवार के दिन आँवले के फल से स्नान करता है तथा उसको खाता है उसकी आयु धन और पत्नी ये सबके सब विनष्ट हो जाते हैं ॥२५॥ संक्रान्ति के दिन, शुक्रवार को, षष्ठी तिथि को, प्रतिपदा तिथि को, नवमी को तथा अमावस्या को आँवले का दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए ॥२६॥ संक्रान्ति, शुक्रवार, षष्ठी तिथि, नवमी तथा आमावस्या को आँवले का दूर से ही परित्याग करना चाहिए ॥२७॥ मरा हुआ व्यक्ति जो नासिका, कान, मुख अथवा केश में आँवले का फल रखता है, वह भगवान् विष्णु के लोक मे जाता है ॥२७॥ आँबला का सम्पर्क होने मात्र से मरा हुआ व्यक्ति भगवान् विष्णु के लोक मे जाता है । उसके समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह रथ से स्वर्ग में जाता है ॥२८॥ जो आदमी आपने शरीर में आँवल का रस लगाकर स्नान करता है वह धार्मिक पद-पद पर अश्वमेध का फल प्राप्त करता है ॥२९॥ उसके देखने मात्र से सभी पापी जीव तथा दुष्ट ग्रह पलायन कर जाते हैं ॥३०॥ हे स्कन्द !प्राचीन काल में एक चाण्डाल शिकार के लिए वन में गया वह मृगो और पक्षियों को मारकर प्यास से व्याकुल हो गया ॥३१॥ भूखा हुआ वह सामने विद्यमान बड़े-बड़े फलो वाले आँवला के वृक्ष को देखकर उस पर सहसा चढकर उसके फलों को खाया ॥३२॥ भाग्यवशात् वह वृक्ष के ऊपर से पृथिवी पर गिर पड़ा और अत्यधिक वेदना से पीडित होकर मर गया ॥३३॥ उसके बाद उसके शरीर को ले जाने के लिए सभी प्रेत, राक्षस, भूत तथा यमदूत वहाँ आये ॥३४॥ किन्तु महाबलवान् होने पर भी घे उसके शरीर को नहीं देख पा रहे थे । वे सब परस्पर में यह कहकर झगड़ने लगे कि यह मेरा है, यह मेरा है ॥३५॥ किन्तु घे उसको न तो छू पा रहे थे और न ले जा पा रहे थे । उसके बाद वे मुनियों को देखकर उनलोगों के पास गये॥३६॥ ् रेतों ने कहा-- हे धीर मुनियों इस पापी चाण्डाल को न तो हमलोग और न यमदूत क्यों नही देख पा रहे हैं?॥३७॥ जो लोग ऊपर से गिरकर युद्ध से पलायन करके, साहसिक कर्म के कारण, गिराये गये, भयभीत बिजली
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know