Srishti Khanda Extracted Page 788

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-788

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Sanskrit Original

SS SII 4७७० IIS Dis FMS 536 क >ूजड सृष्टिखण्ड ७६३ संयते पारणे चैव धात्र्येकस्पर्शने नर: | भुक्त्वा तु लंघयेद्यस्तु एकादश्यां सितासिते ॥९॥ एकेनैवोपवासेन कृतेन तु षडानन । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः॥१०॥ अक्षयं लभते स्वर्ग विष्णुसायुज्यमात्रजेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन धात्रीब्रतं समाचर ॥११॥ धात्री द्रवेण सततं यस्य केशाः सुरंजिताः। न पिबेत्स पुनर्मातुः स्तनं कश्चित्षडानन॥९२॥ धात्री दर्शनसंस्पर्शान्नाप्उउच्चारणेपि वा। वरदः संमुखो विष्णुः संतुष्टो भवति प्रियः॥१३॥ धात्रीफलं च यत्रास्ते तत्र तिष्ठति केशवः। तत्र ब्रह्मा स्थिरापद्मा तस्मात्तां तु गृहे न्यसेत् ॥९४॥ अलक्ष्मी नश्यते तत्र यत्र धात्री प्रतिष्ठति । संतुष्टाःसर्वदेवाश्च न त्यजंति क्षणं मुदा॥९५॥ धात्री फलेन नैवेद्यं यो ददाति महाधनम् । तस्य तुष्टोभवेद्विष्णुर्नान्यैः क्रतुशतैरपि ॥१६॥ स्नात्वा घात्रीद्रवेणैव पूजयेद्यस्तुमाधवम् । सोभीष्टफलमाप्रोति यद्वा मनसि वर्तते ॥१७॥ तथैव लक्षणं स्मृत्वा पूजयित्वा फलेन तु । सुवर्णशतसाहस्रं फलमेति नरोत्तमः ॥१८॥ या गार्ति्ञानिनां स्कंद मुनीनां योगसेविनाम्। गतिं तां समावाप्रोति धात्रीसेवारतो नरः ॥९९॥ तीर्थसेवाभिगमने व्रतैश्च विविधैस्तथा । सागतिर्लभ्यते पुंसां धात्रीफलसुसेवया ॥२०। प्रीतिश्च सर्वदेवानां देवीनां नो गणस्य च । संमुखा वरदा स्नाने धात्रीफलनिषेवणे ॥२९॥ ग्रहा दुष्टाश्च ये केचिदुग्राश्च दैत्यराक्षसाः । सर्वे न दुष्टतां यांति धात्रीफलसुसेवनात् ॥२२॥ सर्वयज्ञेषु कार्येषु शस्तं चामलकी फलम्। सर्वदेवस्य पूजायां वर्जयित्वा रविं सुत ॥२३॥ के समय आँवले का प्रयोग अवश्य करे ॥८॥ संयत होकर पारण करने से एक आँवले का स्पर्श करने वाला तथा आँवला खाकर दोनो एकादशी का उपवास करने वाला मनुष्य ॥९॥ एक ही उपवास के द्वारा सात जन्मों में किए गये पापों से मुक्त हो जाता है ॥१०॥ वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करके भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है, अतएव सारे प्रयत्नों के द्वारा आँवले का व्रत करो ॥११॥ जिसके केश सदैव आँवले के रस से रंजित होते हैं, वह पुनः संसार में आकर अपनी माता के स्तन पान को नहीं करता है ॥१२॥ आँवला के दर्शन, स्पर्श, तथा नामोच्चारण करने मात्र से वर देने वाले भगवान् संतुष्ट होते हैं । वहाँ पर ब्रह्माजी तथा लक्ष्मीजी स्थिर रहती है, अतएव आँवले के फल को अपने घर में रखना चाहिए ॥१४॥ जहाँ पर आँवला रहता है वहाँ की अलक्ष्मी का नाश हो जाता है, सभी देवता वहाँ प्रसन्नता पूर्वक रहते हैं, वे उस स्थान को क्षण भर के लिए भी नहीं त्यागते हैं ॥१५॥ जो आँवले के फल का भगवान् को भोग लगाता है, उस पर भगवान् विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं, सैकड़ों यज्ञों के करने से वे उतना प्रसन्न नहीं होते हैं ॥१६। जो मनुष्य आँवले के रस से स्नान करके भगवान् माधव की पूजा करता है वह अपने अभिप्रेत फल को प्राप्त करता है अथवा जो उसके मन में रहता है उसे प्राप्त करता है ॥१७॥ इसी लक्षण का स्मरण करके तथा आँवले के फल से पूजा करके श्रेष्ठ मनुष्य सुवर्ण के एक लाख द्रव्य का फल प्राप्त करता है॥ १८॥ हे स्कन्द ! जो गति ज्ञानी मनुष्यों तथा योगियों को प्राप्त होती हे, वही गति आवले की सेवा करने वाले की भी होती है ॥१९॥ तीर्थाटन करने, तथा अनेक प्रकार के व्रतों को करने से जिस फल की प्राप्ति होती हे, उस फल की प्राप्ति मनुष्य धात्री फल का सेवन करके प्राप्त कर लेता है ॥२०॥ आँवले के फल का सेवन करने से सभी देवताओं, देवियों था मेरे गणों की प्रसन्नता होती है वे उसका वरदान देते हैं और उस मनुष्य के अभिमुख रहते हैं॥२१॥ धात्री फल का सेवन करने वाले के जो दुष्ट ग्रह होते हैं, तथा उग्र दैत्य एवं राक्षस होते हें, वे सबके सव शान्त हो जाते हैं ॥२२॥ सभी यज्ञों तथा कार्यो में आँवले का फल प्रशस्त होता है सूर्य को छोड़कर सभी देवताओं

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