Srishti Khanda Extracted Page 787
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-787
Sanskrit Original
Ee श्रीपद्यमहापुराण स शैवो वा भवेच्छाक्तो गाणपत्योऽथसौरकः । यो दधाति मृतो मालामेकं रुद्राक्षकं तु वा॥२१०॥ यः पठेत्पाठयेद्वापि आवयेच्छृणुतेपि वा । सर्वपापात्प्रमुक्तात्मा सुखं स्वर्गं लभेत् क्रमात् ॥२९९॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे रुदराक्षमाहात्म्यं नामैकोनषष्ठितमोऽ ध्यायः ॥५९॥ —— te साठवाँ अध्याय स्कन्द उवाच अपरस्यापि पृच्छामि फलस्य पूततां तरोः । सर्वलोकहितार्थाय वद नो जगदीश्वर ॥१॥ ईश्वर उवाच धात्रीफलं परं पूतं सर्वलोकेषु विश्रुतम् । यस्य रोपान्नरो नारी मुच्यते जन्मबंधनात् ॥२॥ पावनं वासुदेवस्य फलं प्रीतिकरं शुभम् । अस्य भक्षणमात्रेण मुच्यते सर्वकल्मषात् ॥३॥ भक्षणे च भवेदायुः पाने वै धर्मसंचयः । अलक्ष्मीनाशनं स्नाने सर्वैश्वर्यमवाप्रुरात्॥४॥ यस्मिन् गृहे महासेन धात्री तिष्ठति सर्वदा। तस्मिन् गृहे न गच्छंति प्रेता दैतयराक्षसाः ॥५॥ न गंगा न गया चैव न काशी न च पुष्करम्। एकैव हि नृणां धात्री संप्राप्ते हरिवासरे ॥६॥ एकादश्यां पक्षयुगे धात्रीस्नानं करोति यः । सर्वपापक्षयं यांति विष्णुलोके महीयते ॥७॥ धात्रीफलं सदा सेव्यं भक्षणे स्नान एव च । नियतं पारणे विष्णो; स्नानमात्रे हरेर्दिने ॥८॥ या शाक्त या गाणपत्य अथवा सौर (सूर्य भक्त) होता है ॥२१०॥ जो इस कथा को सुनता है या सुनाता है या पढता अथवा पढवाता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर क्रमश: सुखपूर्वक स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥२१९१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के रुद्राक्ष माहात्म्य वर्णन नामक उनसठवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।५९।। — Oe धात्री (आँवले) का माहात्म्य, प्रेते की कथा तथा तुलसी का माहात्म्य वर्णन स्कन्द ने कहा-- हे जगदीश्वर ! में दूसरे भी पवित्र वृक्षों की पवित्रता के विषय में पूछ रहा हूँ उसे आप वतलायें, जिससे कि संसार का कल्याण हो । ईश्वर ने कहा-- धात्री (ऑवला) का फल अत्यन्त पवित्र हे । उसके रोपने मात्र से ही खत्री अथवा पुरुष जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं ॥२॥ वह पवित्र तथा भगवान् वासुदेव को प्रसन्न करने वाला है । इसको खाने मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥३॥ आंवले के खाने से आयु बढती है और उसका रस पीने से धर्म बढता है । आँवले के रस से स्नान करने से अलक्ष्मी का नाश होता हे तथा सभी ऐश्वर्या की प्राप्ति होती है ॥४॥ हे महासेन ! जिसके घर में आँवले का फल सदैव रहता है, उस घर में प्रेत, दैत्य तथा राक्षस प्रवेश नहीं करते हैं ॥५॥ यदि एकादशी के दिन एक आँवला का फल मिल जाय तो गङ्गा में, गया में, काशी में तथा पुष्कर में जाने की कोई आवश्यकता नहीं है ॥६॥ दोनों पक्षों की एकादशी तिथि को जो आँवले से स्नान करता है, उसके सभी पातक क्षीण हो जाते हैं और वह भगवान् विष्णु के लोक में पूजित होता है ॥७॥ भोजन तथा स्नान के समय आँवले के फल का सदा सेवन करना चाहिए । एकादशी के पारण में तथा स्नान करने
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