Srishti Khanda Extracted Page 785

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-785

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Sanskrit Original

Nae श्रीपद्ामहापुराण गोमेधं नरमेधं च कृत्वा यत्फलमश्नुते । यत्फलं शीघ्रमाप्रोति वञ्रादेश्च निवारणम् ॥९८८॥ नैववह्वेर्भयं चैव न च व्याधिः प्रवर्तते। अर्थलाभं सुखं भुंक्त ईश्वरो न दरिद्रता ॥९८९॥ हस्त्यश्चनरमार्जारमूषकाज्छशकांस्थतथा । व्यालदंष्ट्रिसृगालादीन् हत्वा व्याघातयत्यपि ॥१९०॥ मुच्यते नात्र संदेहो वक्त्रद्वादशधारणात् । वक्त्र त्रयोदशो रुद्रो रुद्राक्षः प्राप्यते यदि॥१९१॥ शंतमः स तु विज्ञेयः सर्वकामफलप्रदः । सुधारसायनं चैव धातुवादश्च पादुका॥१९२॥ सिध्यंति तस्य वै सर्वे भाग्ययुक्तस्य षण्मुख । मातृपितृस्वसृभ्रातृगुरून्वाथ निहत्य च ॥१९३॥ मुच्यते सर्वपापेभ्यो त्रयोदशास्यधारणात् । अक्षयं लभते स्वर्गं यथा देवो महेश्वरः ॥१९४॥ चतुर्दशमुखं वत्स रुद्राक्षं यदि धारयेत् । सततं मूर्ध्नि बाहौ वा शक्ति पिंडंशिवस्य च।॥१९५॥ कि पुनर्बहुनोक्तेन वर्णितेन पुनः पुनः। पूज्यते सततं देवैः प्राप्यते पुण्यगौरवात् ॥१९६॥ कार्तिकेय उवाच भगवन् श्रोतुमिच्छामि वक्त्रे वक्त्रे यथाविधि । न्यसनं केन मंत्रेण धारणं वा कथं वद ॥१९७॥ ईश्वर उवाच शृणु षण्मुख तत्त्वेन वक्त्रे वक्त्रे यथाविधि । अमंत्रोच्चारणादेव गुणाह्योते प्रकीर्तिताः ॥१९८॥ यः पुनम॑त्रसंयुक्तं धारयेद्धवि मानवः । गुणास्तस्य महत्त्वं च कथितुं नैव शक्यते ॥१९९॥ इदानीं मंत्रा दिश्यंते ॐ रुद्र एकवक्त्रस्य, ॐ खं द्विवक्त्रस्य ॐ बुं त्रिवक्त्रस्य, ३ ह्लीं चतुर्वक्त्रस्य, ॐ ह्वां पंचवक्त्रस्य, ॐ हूं षड्वक्त्रस्य, ॐ ह्वः सप्तवक्त्रस्य, ३७ कं अष्टाक्त्रस्य, ३७ जूं नववक्त्रस्य, ॐ क्षं दशवक्त्रस्य, ॐ श्रीं एकादशवक्त्रस्य, ३७ ह्लीं द्वादशवक्त्रस्य, ॐ क्षीं त्रयोदशवक्त्रस्य, ३ व्रां चतुर्दशवक्त्रस्य, है, उस फल की प्राप्ति मनुष्य द्वादशमुखी रुद्राक्ष के धारण से कर लेता है । उससे वज्रपात इत्यादि नहीं होता है॥१८८॥ उसके यहाँ अग्नि और रोग का भय नहीं होता है । वह अर्थलाभ करके सुख भोग करता है और ईश्वर हो जाता है । उसको दरिद्रता नहीं होती है ॥१८९॥ हाथी, घोडा, मनुष्य, बिल्ली, चूहा, खरगोश, सर्प, दाँत वाले जीव शृगाल इत्यादि को मारकर भी वह ॥१९०॥ उसके पाप से निःसन्देह रूप से मुक्त हो जाता है । यह द्वादशमुखी रुद्राक्ष धारण का फल है । यदि त्रयोदशमुखी रुद्राक्ष मिल जाय तो वह साक्षात् रुद्र स्वरूप होता है।। १९ १॥ उसको सर्वाधिक शान्तिप्रद तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला जानना चाहिए । हे षण्मुख ! उस द्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति की अमृत रसायन, धातुवाद तथा पादुका ये सबके सब सिद्ध होते हैं ॥१९२॥ हे वत्स ! यदि कोई चतुर्दशमुखी रुद्राक्ष को सदा शिर तथा भुजा में धारण करता है तो वह शिव का शक्तिपिण्ड रुद्राक्ष होता है ॥१९५॥ इसको धारण करने वाले के विषय में बहुत क्या कहना है, देवता उसकी सदैव पूजा करते हैं । अत्यधिक पुण्य होने पर ही वह रुद्राक्ष प्राप्त होता है ॥१९६॥ कार्तिकेयजी ने कहा-- हे भगवन् ! रुद्राक्ष के प्रत्येक मुखों में किस मन्त्र से न्यास करना चाहिए तथा धारण कैसे करना चाहिए इसे आप मुझे बतलायें।॥ १९७॥ शिवजी ने कहा-- हे षणमुख सुनो ! प्रत्येक मुख में मन्त्रों का न्यास किए बिना ही ये सभी गुण होते हैं ॥१९८॥ जो मनुष्य भूलोक में मन्त्रपूर्वक रुद्राक्ष को धारण करता हैं उसके गुणों तथा महत्त्व का वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥१९९॥ अब मैं उन मन्त्रों को बतलाता हूँ एकमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओम् रुद्र है दो मुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओं खम् है । तीन मुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओं बुं हैं चमुर्मुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओं हरीं है, पञ्चमुखी रुद्राक्ष का मन्त्र ओं

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