Srishti Khanda Extracted Page 784
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-784
Sanskrit Original
यत्पापं लभते मर्त्यः सर्व नश्यति तत्क्षणात् । देवस्य सदृश भोग्यं त्रैलोक्ये निश्चितं लभेत् ॥९७४॥ अष्टवक्रो महासेन: साक्षाद्देवो विनायकः । अस्यैव धारणादेव यत्पुण्यं तच्छ्णुष्वमे॥१७५॥ जन्मजन्म न मूर्खः स्यान्नातुरो न च नष्टधी: । अविध्नं सर्वकार्येषु तस्यैव सततं भवेत्॥१७६॥ नैपुण्यं लिपिकार्येषु महाकार्येषु कौशलम् । सर्वारंभादिकार्येषु क्षमं तस्य दिने दिने॥९७७॥ अर्थकूटं तुलाकूटं सर्वकूटं तथैव च । शिश्चोदरकरेणैव संस्पृशेद्वा गुरुस्त्रियम्॥१७८॥ एवमादीनि सर्वाणि हंति पापानि सर्वथा । अक्षयं त्रिदिवं भुक्त्वा मुक्तो याति परां गतिम्॥१७९॥ गुणान्येतानि सर्वाणि अष्टवक्त्रस्य धारणात् । नवास्यं भैरवं प्रोक्तं धारयेद्यस्तु बाहुतः ॥१८०॥ कपिलं मुक्तिदं धृत्वा मम तुल्यबलो भवेत्। लक्षकोटिसहस्राणि ब्रह्महत्या: करोति यः ॥१८९॥ ता:सर्वा दहते शीघ्रं नववक्त्रस्य धारणात् । सुरलोके सदादेवैः पूजितो मघवान्यथा ॥१८२॥ हरवद्वरवेश्मस्थो गणेशो नात्र संशय: । पन्नगाश्च विनश्यंति दशवक्त्रस्य धारणात् ॥१८३॥ चक्त्रे चैकादशे वत्स रुद्राश्चैकादशस्मृताः । शिखायां धारयेन्नित्यं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥१८४॥ अश्वमेधसहस्राणि यज्ञकोटिशतानि च । गवांशतसहस््रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् ॥१८५॥ तत्फलं शीपघ्रमाप्रोति वक्त्रैकादशधारणात्। हरस्य सदृशो लोके पुनर्जन्म न विद्यते ॥१८६॥ रुद्राक्षं द्वादशास्यं यः कंठदेशे तु धारयेत् । आदित्यस्तुष्यते नित्यं द्वादशास्ये व्यवस्थितः ॥१८७॥ विषव्याप्त नहीं होता है ॥१७२॥ इसकी प्रसन्नता के कारण सभी पाप प्रतिदिन विनष्ट हो जाते हैं । ब्रह्महत्या, मदिरापान, चोरी तथा गुरु की शय्यापर सोना आदि से उत्पन्न पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाते हैं । वह त्रैलोक्य में देवता के समान भोगों को प्राप्त करता है ॥१७३-१७४॥ आठ मुखों वाला रुद्राक्ष साक्षात् गणेश स्वरूप होता है, इसके धारण करने से होने वाले पुण्य को तुम सुनो ॥१७५॥ वह किसी भी जन्म में न तो मूर्ख होता है, न रोगी होता है कभी भी उसके कार्यो में कोई विघ्न नहीं आता है ॥१७६॥ लिखने के काम में उसको निपुणता प्राप्त होती है और सभी कार्यो के करने में वह कुशल होता है । वह सभी कार्यो के करने में प्रतिदिन समर्थ बना रहता है ॥१७७॥ उसके अर्धकूट, तुलाकूट तथा सर्वकूट जन्य पाप शिश्न, उदर या हाथ से गुरु पत्नी के स्पर्श जन्य पाप, इसीतरह के दूसरे भी पाप आठमुखी रुद्राक्ष के धारण से तत्काल विनष्ट हो जाते हैं । वह अक्षय स्वर्गलोक का भोग करके मुक्त हो जाता है ॥१७८-१७९॥ ये सभी आठ गुण आठ मुखी रुद्राक्ष के धारण के हैं । नवमुखी रुद्राक्ष भैरव स्वरूप होता है । उसको जो अपनी भुजाओ में धारण करता है ॥१८०॥ उस कपिल वर्ण के मुक्तिप्रद रुद्राक्ष को धारण करने वाला मेरे समान बलवान् होता है । लाख करोड़ ब्रह्महत्या को करने वाले के भी सभी पापों को नवमुखी रुद्राक्ष तत्क्षण ही भस्म कर देता है और देवलोक में देवता उसकी इन्द्र के समान पूजा करते हैं ॥१८१-१८२॥ शङ्करजी के ही समान वह श्रेष्ठ गृह में स्थित गणेश हो जाता है । दशमुखी रुद्राक्ष के धारण करने से सर्पो का विनाश हो जाता है ॥१८३॥ हे वत्स ! ग्यारह मुखी रुद्राक्ष में ग्यारहो रुद्रों का निवास होता है । जो व्यक्ति इसको अपनी शिखा में धारण करता है, में उसका फल बतलाता हुँ ॥१८४॥ हजारो अश्वमेघ यज्ञों, सैकड़ों करोड़ अन्य यज्ञां तथा विधिपूर्वक एक लाख गायों के दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है ॥१८५॥ उस फल की प्राप्ति एकादश मुखी रुद्राक्ष के धारण से हो जाती है, वह मनुष्य लोक में शिवजी के समान हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है ॥१८६॥ यदि कोई मनुष्य अपने गले में द्वादशमुखी रुद्राक्ष को धारण करता है तो उससे आदित्य की तुष्टि होती है । उस रुद्राक्ष में द्वादशादित्य का निवास होता है ॥१८७॥। गोमेध तथा नरमेध याग से जिस फल की प्राप्ति होती
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