Srishti Khanda Extracted Page 783

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-783

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Sanskrit Original

महेशस्तुष्यते नित्यं भूतानामधिपो भवेत् । सद्योजातस्तथेशानस्तत्पुरुषोऽघोर एव च॥१५९॥ वामदेव इमे देवा वक्त्रैः पंचभिराश्रिता: । अतः सर्वत्रभूयिष्ठाः पंचवक्त्रो धरातले ॥१६०॥ रुद्रस्यात्मजरूपोऽयं तस्मात्तंधारयेद्बुधः । कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ॥१६ ९॥ तावत्कालं शिवस्याग्रे पूजनीयः सुरासुरैः । सार्वभौमो भवेद्धूमौ शर्वतेजाः शिवालये ॥१६२॥ तस्मात्सर्वप्रयत्मेन पंचवक्त्रं तु धारयेत्। षड्वक्त्रं कार्तिकेयं तु धारयन् दक्षिणे भुजे ॥१६३॥ ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः । स्कंदस्य सदृशः शूरः कल्पांते समुपस्थिते ॥१६४॥ नात्र पराजयं चैति गुणानामाकरो भुवि। कुमारत्वमवाप्रोति यथागौरीशनंदनः ॥१६५॥ ब्राह्मणो भूषपूज्यश्च क्षत्रियो लभते जयम्। वैश्याः शूद्रादयो वर्णाः सदैश्चर्यप्रपूरिताः ॥ तस्यैव वरदा गौरी मातेव सुलभा भवेत् ॥१६६॥ ततो भुजबलादेव विश्वतेजा भवेन्नरः । वाग्मी धीरस्सभायां च नृपवेश्मनि संसदि ॥१६७॥ न च कातरतामेतिनैव भंगो भवदेश्लुवम् ॥९६८॥ एतान्यन्यानि सर्वाणि षड्वक्त्रस्यैव धारणात्। सप्तवक्त्रो महासेनस्त्वनंतो नाम नागराट् ॥१६९॥ अस्य प्रत्येकवक्त्रे तु प्रतिनागा व्यवस्थिताः । अनंतः कर्कटश्चैव पुंडरीकोऽथ तक्षकः ॥१७०॥ विषोल्बणश्च कारीषः शंखचूडश्च सप्तमः । एतेनागा महावीर्याः सप्तवक्त्रे व्यवस्थिताः ॥१७१॥ अस्य धारणमात्रे तु विषं न क्रमते तनौ। हरश्च परमप्रीतो भवेन्नागेश्वरे यथा ॥१७२॥ प्रीत्यास्य सर्वपापानि क्षयं यांति दिने दिने । ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयादि गुरुतल्पजम्॥१७३॥ यह चतुर्मुखी रुद्राक्ष के धारण की महिमा है ॥१५८॥ उससे शङ्करजी सदा सन्तुष्ट रहते हैं वह सभी जीवों का स्वामी होता है, सद्योजात, ईशान, तत्पुरुष, अघोर ॥१५९॥ तथा वामदेव ये पाँचो देवता पाँचमुखी रुद्राक्ष में रहते हैं । अतएव पञ्चमुखी रुद्राक्ष सर्वत्र पृथिवी पर अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है ॥१६०॥ यह रुद्र के पुत्र स्वरूप है अतएव इसको धारण करना चौहिए । करोड़ हजार कल्प तथा सैकड़ों हजार कल्पों तक ॥१६१॥ उसको धारण करने वाला शिव के समक्ष पूज्यं होता है । वह भूलोक में सर्वभौम राजा होता है तथा शिवलोक में जाकर शिव के तेज से सम्पन्न होता है ॥१६२॥ अतएव सभी प्रयत्नों के द्वारा पञ्चमुखी रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए । छह मुखी द्राक्ष कार्तिकेय स्वरूप होता है और उसको दाहिनी भुजा में धारण करने वाला ॥१६३॥ ब्रह्महत्या आदि के पापों से मुक्त हो जाता है । कल्प के अन्त में वह स्कन्द के ही समान शूरवीर होता है ॥१६४।॥ उसका कहीं भी पराजय नहों होता है, वह गुणों का आकर होता है । वह गौरीश नन्दन के ही समान कुमारत्व को प्राप्त करता है ॥१६५॥ उसको धारण करने वाला ब्राह्मण राजा का पूज्य होता है, क्षत्रिय विजयी होता है, वैश्य तथा शूद्र आदि वर्ण सदा ऐश्वर्य से परिपूर्ण होते हैं । उसको वरदात्री गौरी, माता के समान सुलभ होती हैं ॥१६६॥ उसके बाद अपनी भुजा के बल से ही सम्पूर्ण तेजो से सम्पन्न वह मनुष्य सभा में, राजगृह में तथा संसद में वाग्मी (बोलने में निपुण) तथा धैर्य सम्पन्न होता है ॥१६७॥ उसमें न तो कायरता आती है और न वह हतोत्साह होता है ॥१६८॥ ये सभी गुण छह मुखी रुद्राक्ष के धारण से आते हैं । सप्तमुखी रुद्राक्ष महासेन अनन्त नामक नागराज स्वरूप होता है ॥१६९॥ इसके प्रत्येक मुख में अलग-अलग नागों का निवास होता है । अनन्त, कर्कट, पुण्डरीक, तक्षक, विषोल्वण, करीष और शंखचूड, ये महाबलवान् सात नाग सप्तमुखी रुद्राक्ष में व्यवस्थित हैं ॥१७०-१७१॥। इस रुद्राक्ष के धारण करने मात्र से कभी भी शरीर में विष व्याप्त नहीं होती है, उसी तरह जिस तरह नागेश्वर शिवजी के शरीर में कभी

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