Srishti Khanda Extracted Page 781

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-781

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Sanskrit Original

SE श्रीपद्ममहापुराण ततो5जगवमासज्यबाणमंतकसत्रिभम् । धृत्वा तं च जघानाथ दृष्ट दिव्येन चक्षुषा ॥१३३॥ सपपात महीपृष्ठे महोल्केव च्युतो दिवः । घटनव्याकुलाद्रुद्रात्पतिता स्वेदबिंदवः॥१३४॥ तत्राश्रुबिंदुतोजातो महारुद्राक्षकः क्षितौ। अस्यैव च फलं जीवा न जानंत्यतिगुह्यतः ॥१३५॥ ततः कैलासशिखरे देवदेवं महेश्वरम् । प्रणम्य शिरसा भूमौ स्कंदो वचनमब्रवीत् ॥१३६॥ स्कन्द उवाच रुद्राक्षस्य फलं नाथ ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः । जप्येथ धारणे चैव दर्शने स्पर्शनेपि वा ॥१३७॥ ईश्वर उवाच लक्षं तु दर्शनात्पुण्यं कोटिवैं स्पर्शनेन च। दशकोटिफलं पुण्यं धारणाल्लभते नरः ॥१३८॥ लक्षकोटिसहस्राणि लक्षकोटिशतानि च । जप्त्वास्यलभते पुण्यं नात्र कार्या विचारणा ॥१३९॥ उच्छिष्टो वा विकर्मस्थो युक्तो वा सर्वपातकैः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्राक्षघारणेन वै ॥९४०॥ कंठे रुद्राक्षमादाय श्वापदो प्रियते यदि । सोपि रुद्रत्वमाप्रोति किं पुन र्मानुषादयः ॥९४९॥ ध्यानधारणहीनोपि रुद्राक्ष यदि धारयेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥१४२॥ कार्तिकेय उवाच एकवक्त्रं द्वित्रिचतुः पंचषड्वक्त्रमेव च । सप्ताष्टनववक्त्रं च दशैकादशवक्त्रकम् ॥१४३॥ रुद्राक्षं द्वादशास्यं च त्रयोदशमुखं तथा । चतुर्दशास्यसंयुक्तं स्वयमुक्तं च शंकरम्॥९४४॥ तेषां च तन्मुखानां च देवताः काश्च तद्वद। गुणो वा कीदृशस्तेषां दोषो वा जगदीश्वर॥१४५॥ यदि मेऽनुग्रहो वास्ति कथयस्व यथार्थतः। भी शङ्करजी से निवेदन किया ॥१३२॥ इसके बाद अजगव धनुष धारण करके उस पर यमराज के समान भयङ्कर बाण चढाकर अपनी दिव्य दृष्टि से उसे देखकर शङ्करजी ने उसका वध कर दिया ॥१५३३॥ वह पृथिवी पर आकाश से टूटी हुयी महोल्का के समान गिर पड़ा । इस कार्य को करने से श्रान्त शिवजी के शरीर से स्वेद की विन्दुएँ पृथिवी पर गिरीं ॥१३४॥ वहाँ पर आँसू की विन्दु से महारद्राक्ष उत्पन्न हुआ । इसके रहस्यात्मक फल को जीव नहीं जानते हैं ॥१३५॥ उसके बाद कैलास पर्वत पर देवाराध्य भगवान् शिव को पृथिवी पर शिर सटाकर प्रणाम करके उनसे स्कन्दजी ने पूछा ॥१३६॥ स्कन्दजी ने कहा-- हे नाथ ! में रुद्राक्ष की महिमा को तत्त्वत: जानना चाहता हूँ । मन्त्र जपने में, धारण करने में तथा दर्शन करने एवं स्पर्श करने से जो फल होता है, उसे में जानना चाहता हुँ॥।१३७॥ शङ्करजी ने कहा-- रुद्राक्ष का दर्शन करने से लाख गुना पुण्य होता है तथा स्पर्श करने से करोड़ गुना पुण्य होता है । उसको धारण करने से दश करोड़ गुना पुण्य होता है ॥१३८॥ रुद्राक्ष की माला से जप करने से लाख करोड़ गुणा तथा लाख करोड़ सौ गुना फल होता है, इस विषय में कोई विचार नहीं करना चाहिए ॥१३९॥ रुद्राक्ष को धारण करने मात्र से ही उच्छिष्ट रहने वाला अथवा पापी मनुष्य भी सभी पापों से मुक्त हो जाता है॥१४०॥ यदि कोई जीव गले में रुद्राक्ष धारण करके मर जाता है तो वह भी रुद्रत्व को प्राप्त कर लेता है, मनुष्यों आदि के विषय में क्या कहना है 2॥१४१॥ ध्यान तथा धारणा से रहित व्यक्ति भी यदि रुद्राक्ष धारण करता है तो वह भी सभी पापों से मुक्त होकर मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ॥१४२॥ कार्तिकेयजी ने कहा-- स्वयं शङ्करजी ने रुद्राक्ष | को एकमुख वाला, दो मुखी, तीन मुखी, चार मुखी, पाँच मुखी, छह मुखी, सात मुखी, आठ मुखी, नव मुखी, | दश मुखी, ग्यारह मुखी, बारह मुखी, तेरह मुखी और चौदह मुखी बतलाया है ॥१४३-१४४॥ उन सबों के तथा उनके |

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