Srishti Khanda Extracted Page 779

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-779

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण य इदं श्रृणुयान्नित्यं पुण्याख्यानमनुत्तमम्। अक्षयं लभते स्वर्ग प्रासादादे: फलं लभेत् ॥१०६॥ धनिनां चेश्वराणां च तथा पुण्यवतां पुनः । पाठयित्वा पठित्वा तु नरः स्वर्गात्न हीयते॥९०७॥ देवानां दासदासीनां सदा देवालयेषु च । पठेद्यस्तु सदा विप्रो मोक्षमार्ग स गच्छति ॥१०८॥ जृपाणामौश्वराणां च धनिनां गुणिनां पुरः । पठित्वा मोक्षमाप्रोति श्रवणात्तत्फलं लभेत् ॥१०९॥ द्विजा ऊचुः सामान्येकः परः पुण्यो मर्त्यलोके द्विजोत्तम। सुलभो मर्त्यपूज्यस्तु मुनीनां च तपस्विनाम् ॥१९०॥ चातुर्वण्याश्रमाणां च पापपुण्यवतां नृणाम् । गुणा गुणवतां चैव वर्णा वर्णवतां तथा ॥१११॥ व्यास उवाच सर्वेषामेव भूतानां रुद्राक्षेण युतो वरः । दर्शनाद्यस्य लोकानां पापराशिः प्रलीयते ॥११२॥ स्पर्शनाहिवमश्चाति धाराणाद्रौद्रतां ब्रजेत् । शिरस्युरसि बाहौ च रुद्राक्षं धारयेत्तु यः ॥१९३॥ स चेशानसमो लोके मखे सर्वत्रगोचर: । यत्र तिष्ठत्यसौ विप्रस्स देशः पुण्यवान्भवेत् ॥११४॥ तं दृष्ट्वाप्यथवा स्पृष्ट्वा नरः पूयेत कल्मषात् । यज्जप्यं तर्पणं दानं स्तानमर्चा प्रदक्षिणम् ॥९९५॥ यत्किचित्कुरुते पुण्यं निखिलं तदनंतकम् । तीर्थानां च महत्तीर्थ रुद्राक्षस्य फलं द्विजाः ॥९१६॥ अस्यैव धारणाद्देही पापात्पूतोऽतिपुण्यभाक्। गृहीत्वा चाक्षमालां च ब्रह्माग्रंथियुतां शिवाम् ॥९९७॥ यज्जप्तं कृतं दानं स्तोत्रं मंत्रं सुरार्चनम् । सर्व चाक्षयतामेति पापं च क्षयमाव्रजेत् ॥११८॥ मालाया लक्षणं ब्रुमः श्रूयतां द्विजसत्तमाः। तस्यास्तु लक्षणं ज्ञात्वा शैवमार्ग प्रलप्स्यथ ॥१९९॥ है ॥१०५॥ जो व्यक्ति इस पवित्र कथा का नित्य श्रवण करता है, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है तथा प्रासाद इत्यादि बनवाने का भी फल उसको प्राप्त होता है ॥१०६॥ धनिकों, स्वामियों तथा पुण्य पुरुषों को पढाने वाले तथा स्वयं पढने वाले का पुण्य कभी क्षीण नहीं होता है ॥१०७॥ देवताओं के दासों एवं दासियों तथा देवालय में जो सदैव इसको पढता है, वह ब्राह्मण मोक्ष मार्ग को प्राप्त कर लेता है ॥१०८॥ राजाओं, स्वामियों, धनियों तथा गुणी पुरुषों के सामने इसका पाठ करने वाला मोक्ष को प्राप्त करता हैं तथा सुनने वाला भी उसी फल को प्राप्त करता है॥१०९॥ ब्राह्मणों ने कहा-- हे द्विजोत्तम ! मर्त्यलोक में सबसे प्रधान पुण्य क्या है ? मुनियों तथा तपस्वियों में श्रेष्ठ पूज्य एवं सुलभ मनुष्य कौन है ?॥११०॥ वह चारो वर्णो चारो आश्रमों के पापियों तथा पुण्यवानों में गुणियों में गुण, वर्णवालों में वर्ण सुलभ (पुण्यवान मनुष्य कौन) हैं ॥१११॥ व्यासजी ने कहा-- सभी मनुष्यों में रुद्राक्षधारी पुरुष श्रेष्ठ है । उसका दर्शन करने से ही पाप समूह का नाश हो जाता है ॥११२॥ रुद्राक्ष का स्पर्श करने से स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है, धारण करने से रुद्रत्व की प्राप्ति होती है जो व्यक्ति शिर पर, वक्षस्थल पर तथा मुजाओं में रुद्राक्ष धारण करता है ॥११३॥ वह लोक में शङ्करजी के समान होता है तथा यज्ञ में सर्वत्र पवित्र होता है । वह ब्राह्मण जिस स्थान में रहता है वह स्थान पवित्र हो जाता है ॥११४॥ उस ब्राह्मण का दर्शन अथवा स्पर्श करके मनुष्य पाप रहित हो जाता है । वह जो मन्त्र जपता है तर्पण करता है, दान देता हें, स्नान करता है, पूजा करता है अथवा प्रदक्षिणा करता है, वह सब अक्षय होता है । हे ब्राह्मणों ! रुद्राक्ष का फल सभी तीर्थो से बढकर महान् तीर्थ है ॥११५-११६॥ इसका ही धारण करने वाला शरीरधारी पाप से पवित्र तथा अत्यन्त पुण्यवान् हो जाता है । रुद्राक्ष की ब्रह्मग्रंथि से युक्त तथा पवित्र माला लेकर ॥११७॥ जो जप, दान स्तोत्रपाठ, मन्त्र तथा देवार्चन किया जाता है वह सबके सब अक्षय होता है तथा उसके पापों का नाश हो जाता है ॥११८॥ हे द्विजश्रेष्ठों ! मैं माला

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