Srishti Khanda Extracted Page 778
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-778
Sanskrit Original
शिवदासी ततो गत्वा शिवस्य हरणे तथा। भक्षणादन्नपानानांनरो दुर्गतिमाघ्नुयात् ॥९२॥ अतो देवलविप्रो यो नरकान्ननिवर्तते । तस्माद्वेश्या जनानां च दौष्ट्यमेव हितं भवेत् ॥९३॥ अतस्तु गणिकां स्पृष्ट्वा नरः स्मानाद्विशुध्यति। मलिनां दुर्गतिं याति बहुपूरुषसंश्रयात्॥९४॥ वेश्यातपस्विनी या च देवार्चनरता सदा । पतिब्रतपरा शुद्धा स्वर्ग चाक्षयमश्नुते ॥९५॥ गणिकां मातृवद्यस्तु सदासन्नां प्रपश्यति। देववत्सुरलोकेषु निखिलं भोगमश्नुते॥९६॥ सुरासुरनराणां च वंदनीयो यथा हरिः। तथाहोयं सर्वलोके सर्वभूतैकपावनः ॥९७॥ देवदासः सदा यस्तु देवकृत्येषु लोलुपः । स च गच्छति लोकेशो देवलोके महीयते ॥९८॥ एतेषामेवलिंगानि कारयित्वा च मंडपम्। शक्त्या यं लभते नाकं कालस्य निश्चयं श्रृणु॥९९॥ हायनैकं तृणेनैव शरकांडेन तच्छतम् । अयुतं त्वन्यकाष्ठेन लक्षं खादिरदारुणा ॥१००॥ कोटिकोटि च पाषाणैः सुदृढेर्यत्नसंयुतै: । तस्मात्सर्वप्रयतेन मंडपं कारयेद्रुधः ॥१०९॥ यावत्कालं वसेत्स्वर्गे नरो मंडपकारकः । तावत्कालं च हरणे नरो दुर्गतिमाघ्रुयात् ॥१०२॥ जनानां निचरे रम्ये वस्तूनां क्रय विक्रये। आश्रये चाध्वगानां च नदीनदसमागमे ॥१०३॥ देवानां मंडपं कृत्वा यत्फलं लभते नरः । तत्फलं समवाप्रोति द्विगुणं विप्रमंदिरे॥१०४॥ अनाथस्य च दीनस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः। कारयित्वा गृहं रम्यं नरः स्वर्गान्न हीयते ॥९०५॥ नहीं करे ॥९ १॥ शिवदासी के साथ सङ्गम करना तथा शिव सम्पत्ति के हरण के समान है । जिसके कारण शिव के अत्र जल का हरण करने से नरक होता है ॥९२॥ इसीलिए जो देवल ब्राह्मण होता है । (देवता की सम्पत्ति खाने वाला ब्राह्मण) उसका कभी नरक से उद्धार नहीं होता है । अतएव वेश्या लोगों के लिए दूषित होने पर भी कल्याण कारिणी होती है । वेश्या का स्पर्श हो जाने पर स्नान करने से मनुष्य की शुद्धि होती है । अनेक पुरुषों के साथ सङ्गम करने के कारण वेश्या मलिन होती है तथा नरक में जाती है ॥९४॥ जो वेश्या तपस्विनी तथा देवार्चन परायण होती है, वह पतिव्रत परायण होने के कारण अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करती है ॥९५॥ सदा सन्निकट में रहने वाली गणिका को जो माता के समान समझता है । वह देवलोको में देवता के सभी भोगों को प्राप्त करता है ॥९६॥ जिस तरह श्रीहरि देवताओं, असुरों तथा मनुष्यों के लिस सदा वंदनीय हैं, उसीतरह वह पुरुष सभी लोकों को पवित्र बनाने वाला होता है ॥९७॥ जो देवदास देवकार्य को करने के लिए सदैव लोलुप बना रहता है वह लोकेश होकर देवलोक में पूजित होता है ॥९८॥ जो व्यक्ति इन देवताओं का मण्डप बनाकर मूर्तियों को बनवाता है, वह अपनी शक्ति से जितने समय तक स्वर्गलोक को प्राप्त करता है उसे में बतलाता हूँ ॥९९॥ तृण का मण्डप बनाने से एक वर्ष का स्वर्ग मिलता है, शरकण्डे का मण्डप बनाने से सौ वर्ष का दूसरी लकड़ियों से मण्डप बनाने पर दश हजार वर्ष का स्वर्ग प्राप्त होता है । खैर की लकड़ी का मण्डप बनाने पर एक लाख वर्ष तक का स्वर्ग प्राप्त होता है ॥१००॥ पाषाण के द्वारा देव मण्डप बनाने पर करोड़-करोड़ वर्ष का स्वर्ग प्राप्त होता है, अतएव विद्वान् को सप्रयास मण्डप बनवाना चाहिए ।।१०१॥। मण्डप बनाने वाला पुरुष जितने समय तक स्वर्ग में निवास करता है, उस मण्डप को चुराने वाला उतने ही समय तक नरक में निवास करता है ॥१०२॥ लोगों के मनोहर समूह में अथवा वस्तुओं के क्रय-विक्रय स्थल में, पथिकों के रहने के स्थान में नदों एवं नदियों के सङ्गमस्थल में ॥१०३॥ देवताओं का मण्डप बनाने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति किसी वेदज्ञ ब्राह्मण का गृह बनवा देने से होती हे॥१०४॥ विशेष रूप से अनाथ, दीन तथा श्रोत्रिय ब्राह्मण का गृह बनवाने वाले का कभी स्वर्ग से पतन नहीं होता
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