Srishti Khanda Extracted Page 776
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-776
Sanskrit Original
घृतप्रदीप॑ यो दद्यात्मासमेकमहर्निशम् । दिव्यं वर्षायुतं स्वर्गे पूजितो देवसतमैः ॥६५॥ घृतस्नानं तथालिंगे यःकुर्याद्धवि मानवः । कल्पकोटिसहस्राणि मासैके लभते नरः॥६६॥ तिलतैलप्रदीपस्य तथान्यस्यार्द्धकं फलम् । मासैकं जलदानस्य फलेनेश्वरतां व्रजेत् ॥६७॥ धूपदानेन गंधर्व चंदने द्विगुणं भवेत् । मृगमदागरुसत्वस्य दाने बहुफलं भवेत् ॥६८॥ मालापुष्पप्रदानेन नरः स्यात्त्रिदशेश्वरः । शीते तूलपटीं दत्वा सर्वदुः खात्प्रमुच्यते ॥६९॥ जन्मजन्मसु लभ्येत उष्णे च शीतलां पटीम् । दत्वा च मैव सौदेत शक्त्या वस्त्रं ददाति य: ॥७०॥ चतुर्हस्तप्रमाणं च वर्ष्मवेष्टं सुशोभनम् । पिधानं चरणानां च दत्वास्वर्गान्न हीयते ॥७९॥ शक्त्या स्वर्णप्रदानेन स्वर्गे पुज्यो भवेन्नरः | दशयोजनविस्तीर्णे मंडपे रूपभाग्भवेत् ॥७ २॥ सवुर्ण रत्मसयुक्तं दत्त्वा दशगुणं लभेत् । वत्रवैडूर्यगारुत्ममाणिक्यादीननर्घतः ॥७३॥ दत्वा लिंगे विधानाच्च ब्राह्मणे वा यशस्विनि । शतयोजनविस्तीर्णे मंडलेधिपतिर्भवेत् ॥७४॥ तथैव भुवि जातोपि सर्वलोकप्ररंजनः । सुरभिद्रव्यदानेन वावदूकश्च सुंदरः ॥७५॥ रक्तामृतसुकंठश्च पूगदानान्नरो भवेत्। वरदासीप्रदानेन नरः कल्पं वसेदिवि ॥७६॥ वरदासीप्रदानेन उर्व्या जातो धनेश्वरः। तथैव भृत्यदानेन बहुभृत्यो भवेद्िवि ॥७७॥ धरायामक्षया क्रद्धिर्जन्मजन्मसु जायते। सर्वतूर्यप्रदानेन गुणवान् लोकसंमतः ॥७८॥ पृथिवीपति होता है ॥६३॥ विष्णु आदि सभी देवताओं की पूजा करने से जिन फलों की प्राप्ति होती है, उन सबों को में लोक कल्याण की दृष्टि से अलग-अलग बतलाता हूँ ॥६४॥ जो व्यक्ति एक मास तक विष्णु आदि देवताओं की रात-दिन घी का दीपक जलाता है वह देवताओं के दश हजार वर्षो तक स्वर्ग में श्रेष्ठ देवताओं के द्वारा पूजित होता है ॥६५॥। जो मनुष्य एक मास तक शिवलिङ्ग को घृत से स्नान कराता है, वह हजारों करोड़ कल्पों तक स्वर्ग भोगता है ॥६६॥ तिल के तेल का जो रात-दिन एक मास तक दीपक जलाता है, अथवा उससे स्नान कराता है, उसको घी की अपेक्षा आधा फल प्राप्त होता है । एक मास तक जलदान करने वाला ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है॥६७॥ धूप का दान करने से गन्धर्व होता है, चन्दन का दान करने से उसको दो गुना फल होता है । देवता को कस्तूरी तथा अगरु आदि वस्तुओं का दान करने पर बहुत फल होता है ॥६८॥ देवता को माला तथा पुष्प प्रदान करने से मनुष्य देवराज होता है । जाड़े के दिन में सूती रजाई दान करके मनुष्य सभी दुःखों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥६९॥ वह प्रत्येक जन्मों में ग्रीष्मकाल में शीतल वस्त्र को प्राप्त करता है, जो अपनी शक्ति के अनुसार देवताओं को वस्र प्रदान करता है वह कभी दुःखी नहीं होता है ॥७०॥ जो दाता देवताओं को चार हाथ लम्बा शरीर का सुन्दर वस्र प्रदान करता है, तथा चरणों का मोजा देता है, वह स्वर्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होता है ॥७१॥ जो मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार देवता के लिए स्वर्ग दान देता है वह स्वर्ग में पूज्य होता है । वह स्वर्ण में दश योजन विस्तृत मण्डप में अपने सौन्दर्य से सुशोभित होता है ॥७२॥ जो रत्न जटित सुवर्ण दान करता है उसको सुवर्ण दान का दश गुना फल प्राप्त होता है । जो अनर्ध्य, वैडूर्य, गरुत्मत् मणि आदि शिवलिङ्ग के लिए दान देता है अथवा यशस्वी ब्राह्मण को दान देता है वह दशयोजन विस्तीर्ण मण्डप का स्वामी होता है ॥७४।। उसी तरह संसार में भी जन्म लेकर सबलोगों का प्रिय होता है । सुगन्धित द्रव्य प्रदान करने वाला वावदूक और सुन्दर होता है ॥७५॥ पूगीफल का दान का दान करने वाला सुन्दर रागयुक्त तथा अमृत के समान कण्ठ (राग) वाला मनुष्य होता है । श्रेष्ठ दासी का दान करने वाला मनुष्य स्वर्गलोक में एक कल्प तक निवास करता है ॥७६॥ श्रेष्ठ दासी का दान करने
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