Srishti Khanda Extracted Page 775

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-775

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Sanskrit Original

प्रीपद्ममहापुराण भुंक्ते भोगं महाभागो मनःशर्मकरं परम् । रामाभिरामसंपूर्ण सर्वतः सुखदं दिवि ॥५०॥ उर्व्यामक्षयभोग्यानि नृपो वाथ महाधनी। हरस्य प्रतिमा यश्च कृत्वा देवगृहे नरः ॥५१॥ सुलिंगां वा सुरूपां वा कल्पकोटि वसेद्दिवि । स्वर्गाद् भ्रष्टो भवेद्राजा धनी पूज्यतमोपि वा॥५२॥ देवीलिंगेषु सर्वेषु कृत्वा देवगृहं नरः । सुरत्वं प््रप्रुयाल्लोके देव्यास्सर्वसुखोद्धवे ॥५३॥ भृशमच्युततामेति सुखमेति निरामयम् । रत्मसंसृष्टप्रासादे मणिकर्बुर भूतले॥५४॥ रामायुतप्रसंभोग्ये देवीसंसृष्टनिर्भये । नृत्यगीतपरे रम्ये सर्वेद्रियमनोरमे ॥५५॥ रत्ममर्ईलतालाङ्ये सर्वदास्रीजनेरिते । निर्मले सुखदे रम्ये रत्मानांसुशुभे गृहे ॥५६॥ तथैव प्रतिमायाश्च देव्याः प्रासादमुत्तमम् । नियुतं कल्पकोटीनां स्वर्लोकमेति मानवः ॥५७॥ स्वर्गादभ्रष्टो भवेद्धूपो देवीभक्तिपरायणः। एवं च जन्मसाहस््रं स्मर एव भवेद्धुवि ॥५८॥ प्रासादं गाणपत्यं च देव्या वा प्रीतिमान्नरः । कृत्वा सुरगणानां च पूजितो दिवि जायते ॥५९॥ तथैव राजतामेति भोग्यान्देवी पुरे तथा । अविघ्नं सर्वकार्येषु सदैव गणपो यथा ॥६०॥ आज्ञा न स्खलिता तस्य सुरासुरनरेषु च । तथैव सौरप्रासादे फलमाप्नोति नरोत्तमः ॥६१॥ अरोगी सुप्रसन्नात्मा कामदेव समप्रभ: । वरदः सर्वलोकेषु यथाब्रध्नस्तथाहि सः ॥६२॥ सूरस्य प्रतिमायां च गृहं कृत्वाशिलामयम् । कल्पकोटिशतं भुक्त्वा स्वर्गमुर्वीश्वरो भवेत् ॥६३॥ विष्ण्वादिसर्वदेवानामर्चनं यत्पृथक् पृथक । प्रत्येके संप्रवक्ष्यामि नराणां हितहेतवे ॥६४॥ फल को भगवान् विष्णु का मन्दिर बनवाने वाला प्राप्त करता है ॥४९॥ हे महाभाग वह मन में शान्ति प्रदान करने वाले भोगों का भोग करता है मनोरम स्त्रियो से परिपूर्ण सुखद भोगों को घुलोक में भोगता है । वह पृथिवी पर पद्म घनी अथवा राजा होकर अक्षय भोगों को भोगता है । सुन्दर लिङ्ग वाली तथा सुन्दर चिह्न वाली भगवान् शिव की सुन्दर प्रतिमा को जो मन्दिर में बनवाता है वह करोड़ों कल्प तक स्वर्ग लोक में निवास करता है । स्वर्ग से अष्ट होने पर वह पृथिवी पर राजा अथवा पूज्यतम धनी होता है ॥५१-५२॥ जो मनुष्य देवी की सभी मूर्तियों के लिए मन्दिर बनवाता है, वह संसार में देवत्व को प्राप्त कर लेता है । उसके बाद देवी के लोक में सम्पूर्ण सुख सम्पत्ति सम्पन्न।।५३॥ अत्यधिक निरोग रहकर सुख को प्राप्त करता है तथा अच्युतत्व को प्राप्त करता है । जिसकी फर्श मणि जटित हो ऐसे रत्मजटित दशों हजार संभोग्य ललनाओं से युक्त, देवी के द्वारा सृजित, निर्भय, जो सदा नृत्य एवं गीत होने के कारण अत्यन्त मनोहर रहता है ॥५४-५५॥ ऐसे रत्न निर्मित लताओं से परिपूर्ण, सर्वदा स्रीजनों से भरे हुए । निर्मल सुखद रत्नों से सुशोभित प्रासाद के गृह में ॥५६॥ जो देवी की प्रतिमा तथा मन्दिर बनवाता है वह दश हजार करोड़ कल्पों तक स्वर्ग लोक में निवास करता है । जब वह स्वर्ग से भ्रष्ट होता है तो देवी का भक्त राजा होता है । इसतरह से वह हजारों जन्मों को पृथिवी पर प्राप्त करता है, उसे अपने पूर्व जन्मों की यादगारी बनी रहती है ॥५८॥ जो प्रेम पूर्वक गणेशजी का मन्दिर बनवाता है वह स्वर्ग लोक में देवताओं से पूजित होता है । जिसतरह देवों के लोक में भोग्य पदार्थ होते हैं, उसीतरह के भोगों को प्राप्त करता है । अन्त में वह राजा होता है। वह सभी कार्या में गणेशजी के समान विध्नरहित होता है ॥५९-६०॥ उसकी आज्ञा सभी देवता असुर और मनुष्य मानते हैं । उसीतरह सूर्य का मन्दिर बनवाने वाला भी नरश्रेष्ठ फल प्राप्त करता है ॥६१।। वह निरोग अत्यन्त प्रसन्न, तथा कामदेव के समान सुन्दर होतः है । वह सूर्य के ही समान सभी लोकों में वरदान देने वाला होता है॥६२॥ सूर्य की प्रतिमा के लिए पत्थर का गृह बनाने वाला सैकड़ों करोड़ कल्प तक स्वर्ग लोक में निवास करके

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