Srishti Khanda Extracted Page 774
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-774
Sanskrit Original
ना सृष्टिखण्ड ७४९ तथैव गोप्रचारं तु दत्वा स्वर्गान्न हीयते। या गतिगोंप्रदस्यैव ध्रुवं तस्य भविष्यति ॥३६॥ व्यामैकं गोप्रचारं तु मुक्तं येन सुधीमता। तस्यस्वर्गं भवेदिष्टं किमन्यैः पुरुभाषितैः॥३७॥ गोप्रचारं यथाशक्ति यो वै त्यजति हेतुना । दिने दिने ब्रह्मभोज्यं पुण्यं तस्य शताधिकम् ॥३८॥ तस्माद्ववां प्रचारं तु मुक्त्वा स्वर्गान्नहीयते। यश्छिन्नत्ति द्रुमं पुण्यं गोप्रचारं छिनत््यपि ॥३९॥ तस्यैकविशं पुरुषाः पच्यन्ते रौरवेषु च । गोचारघ्नं ग्रामगोपः शक्तो ज्ञात्वा तु दण्डयेत्॥४०॥ छेत्तारं धर्मवृक्षणां विशेषाद्गोप्रचारघम् । तस्य दंडसुखं तस्य तस्मात्तं दंडयेत्तु सः ॥४९॥ प्रासादं कुरुते यस्तु विष्णुलिंगस्य मानवः । त्रिकांडं पंचकाडं च सुशोभं सुघटान्वितम् ॥४२॥ इतोऽधिकं तु यो दद्यान्मृण्मयं वादृषन्मयम्। वसुवृत्तिसुपूर्ण च सुरम्यं दिव्यभूतलम्॥४३॥ प्रतिष्ठाकर्मसंपन्नं किङ्करादिभिरावृतम् । सुलिंगमिष्टदेवस्य विष्णोरेव विशेषतः ॥४४॥ कृत्वा च विष्णुसायुज्यं समाप्रोति नरोत्तमः। तथैव प्रतिमां कृत्वा हरेरन्यतरस्य च॥४५॥ कृत्वा देवकुलं रम्यं यत्फलं लभते नरः । न तन्मखसहस्रैस्तु दानै भुवि ब्रतादिभिः ॥४६॥ कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च । प्रासादे रल्मंयुक्ते सूपूर्णद्रव्यसंकुले ॥४७॥ स वसेत्कामगे याने सर्वलोकमनोहरे । स्वर्गाच्च्युतो भवेद्राजा सार्वभौमो गुणै र्वशी॥४८॥ शिवलिंगे तु प्रासादं कारयित्वा स्वशक्तितः। यदुक्तं विष्णुलिंगे तु तज्ज्ञेयं शिववेश्मनि ॥४९॥ पुनः इस संसार में नहीं आना पड़ता है ऐसे स्वर्गलोक में वह चला गया ॥३४।। अतएव जिसने हाथभर का भी अली पूर्वजन्म में प्रदान किया है, वह राज्य युक्त महान् स्वर्ग में जाता है ॥३५॥ इसीतरह गोचर भूमि दान करने वाला भी स्वर्गलोक से भ्रष्ट नहीं होता है गोदान करने वाले की जो गति प्राप्त होती है, वही गति आली प्रदान करने वाले की भी होती हैं । जो प्रथिवी पर एक गोचर भूमि छोड़ता है, उस बुद्धिमान पुरुष को अभिप्रेत स्वर्ग की प्राप्ति होती है बहुत अधिक दूसरी बातों को कहने से कौन सा लाभ है ?॥३७॥ जो पुरुष अपनी शक्ति के अनुसार गोचर भूमि छोड़ता है, उसको प्रतिदिन सौ ब्राह्मणों को भोजन कराने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, उससे भी अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है ।।३८। अतएव गोचर भूमि छोड़ने वाला स्वर्गलोक से कभी भ्रष्ट नहीं होता है । जो व्यक्ति पवित्र वृक्ष को काटता है, उसको गोचर भूमि को काटने का पाप लगता है ॥३९॥ उसके इक्कीस पीढी के पूर्वज रौरव नरकं में चले जाते हैं । गाव के समर्थ स्वामी को गोचर भूमि को काटने वाले को दण्डित करना चाहिए ।४०॥ विशेष रूप से गोचर भूमि तथा धार्मिक वृक्ष को काटने वाले को दण्ड देने से सुख की प्राप्ति होती है अतएव उसको दण्डित करना चाहिए ॥४१। भगवान् विष्णु की मूर्ति के लिए जो सुन्दर मन्दिर तीन मजिल या अथवा पाँच मंजिल का बनवाता है ॥४२॥ अथवा इससे भी अधिक जो मिट्टी का अथवा पत्थर का मन्दिर बनवाकर उसमें धन, वृत्ति से परिपूर्ण सुन्दर भूमि प्रदान करता है ॥४३॥ सेवकों आदि से दुक्त प्रतिष्ठा कर्म से सम्पन्न, अपने इष्टदेव या भगवान् विष्णु की मूर्ति ॥४४॥ बनवाकर दान करता है वह मनुष्य श्रेष्ठ भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है । उसीतरह श्रीहरि की अथवा किसी दूसरे देवता की सुन्दर मुर्ति बनवाकर मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है उसकी प्राप्ति सैकड़ों यज्ञों दानों तथा ब्रतों आदि के करने से भी नहीं होती है ॥४५-४६॥। वह मनुष्य स्वर्गलोक में हजारों करोड़ कल्पों तक रत्नजटित, तथा सभी द्रव्यों से परिपूर्ण ॥४७॥ प्रासाद में अपनी इच्छा के अनुसार चलने वाले मनोहर विमान में निवास करता है स्वर्ग से भ्रष्ट होने पर वह पृथिवी पर सर्वगुण सम्पन्न सार्वभौम तथा जितेन्द्रिय राजा होता है ॥४८॥ अपनी शक्ति के अनुसार शिवलिङ्ग का मन्दिर बनवाने वाला उसी फल को प्राप्त करता है जिस
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