Srishti Khanda Extracted Page 773

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-773

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Sanskrit Original

"क्ट श्रीपद्ममहापुराण एतस्मिन्नंतरे चैव मोचितः किंकरेण हि । तस्य जन्माभवत्कौ च दुर्विधे चातिवाणिके ॥२२॥ आजन्मविविधं दुःखं भुक्तं पूर्वविकर्मतः । भुक्त्वा क्लेशं महांतं च एकविंशतिहायनम्॥२३॥ तस्मिन् राष्ट्रे मृतो भूपः स्वकर्मपरिपीडितः । एतस्मिन्नंतरेऽ मात्यैः समालोक्य सुमंत्रिभिः ॥२४॥ अनेकपरिमर्शैस्तु पृथिव्यां भ्रमणं कृतम्। तमावृण्वंश्च ते सद्यः सर्वेषां पुरतो दृढम्॥२५॥ ततो राज्याभिषेकश्च कृतस्तैस्तु विमत्सरैः । स॒ च राज्यं च संश्रित्य धर्मराजवरेण च ॥२६॥ अकरोदालिकं कर्म शिलाबद्धं च मृण्मयम्। संक्रमं जलदुर्गे च तरणिं च तथापरे ॥२७॥ बापीकूपतटाकानि प्रपाराममहीरुहम् । कृतवान्विविधं यज्ञं दानपुण्यमतः परम्॥२८॥ स्मरंश्च पूर्वकर्म्माणि सर्वपापक्षयाय वै । कृतं बहुविधं धर्म व्रतानि विविधानि च ॥२९॥ सुराणां ब्राह्मणानां च गुरूणां चैव तर्पणात् । पापात्पूतो ययौ गेहं धर्मराजस्य धीमतः ॥३०॥ स यानस्थं ततो दृष्ट्वा क्रोधरक्तेक्षणो भवत्। स च तं प्रांजलिः प्राह भो धर्म कुरु तारणम् ॥३१॥ चित्रगुप्तोब्रवीद्वाक्यं धर्मराजसमीपतः । चित्रगुप्त उवाच कर्मणा मनसा पूतो विष्णुलोकं स गच्छतु ॥३२॥ व्यास उवाच स तच्छुत्वा पुनश्चाह तस्य विज्ञाय कारणम् । स्मितः प्रीत्या प्रसन्नात्मा गच्छ गच्छाच्युतालयम् ॥३३॥ विमानं सुरलोकाच्च स्वागतं वर्णकर्बुरम् । समारुह्य गतः स्वर्ग पुनरावृत्ति दुर्लभम् ॥३४॥ तस्मात्किष्कुप्रमाणं हि दत्तं येनालिकं पुरा । स तु राज्यान्वयं स्वर्ग महांतं चानुगच्छति ॥३५॥ कहा ठीक है, अब तुम यहाँ से जाओ । अत्यन्त दुःखी होने के कारण तुम मेरी कृपा से अपने पूर्वकालिक वृत्तान्त को याद रखोगे । उसी समय यमदूतों ने उसे छोड़ दिया । उसका जन्म पृथिवी पर अत्यन्त धनिक वनियाँ के यहाँ हुआ ॥२२॥ अपने बुरे कर्म के कारण उसने जन्म से ही अनेक प्रकार के दुःखों को भोगा । उसने इक्कीस वर्षों तक महान क्लेशों को भोगा । उस राष्ट्र में अपने कर्मो के कारण पीडित होकर वहाँ का राजा मर गया । उस समय मन्त्रियों ने अच्छी तरह से विचार करके ॥२३॥ अनेक प्रकार का परामर्श करके पृथिवी पर भ्रमण किया और उन सबों ने उसको ही राजा के रूप में सबों के सामने चुन लिया ॥२४॥ बिना किसी मत्सर के उन सबों ने उसका अभिषेक कर दिया । वह राज्य प्राप्त करके धर्मराज के वरदान के प्रभाव से ॥२५॥ उसने सिढियों को शिलाबद्ध रूप से तथा मिट्टी से बनवाया । उसने जलदुर्ग में सेतु बनवाया । तथा नावों को रखा ॥२६॥ उसके बाद उसने वापी (बावली) कूप, सरोवर, प्याऊ, उद्यान तथा वृक्षों को लगवाया । उसने अनेक यज्ञों तथा दानों एवं पुण्य कर्मों को किया ॥२७॥ पूर्वजन्म के कर्मो को स्मरण करते हुए तथा उनसे उत्पन्न पापों का नाश करने के लिए उसने अनेक प्रकार के धर्मो तथा व्रतों को किया ॥२८॥ उसने देवताओं, ब्राह्मणों तथा गुरुजनों को तृप्त किया । इसतरह से पापों से पवित्र होकर वह धर्मराज के घर गया ॥२९॥ उसको विमान पर बैठे हुए देखकर धर्मराज की आँखे क्रोध से लाल हो गयीं । उसने हाथ जोड़कर कहा हे धर्मराज मेरा उद्धार करो ॥३१॥ धर्मराज के समीप जाकर चित्रगुप्त ने कहा चित्रगुप्त ने कहा-- मन तथा कर्म से पवित्र होने के कारण यह विष्णुलोक में चला जाय ॥३२॥ व्यासजी ने कहा-- इस बात को सुनकर धर्मराज ने उसका कारण जानकर प्रसन्नता पूर्वक मुस्कुराते हुए कहा-- तुम भगवान् अच्युत के लोक में जाओ ॥३३॥ देवलोक से देखने में सुन्दर देवलोक से आया हुआ विमान पर बैठकर जहाँ से

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