Srishti Khanda Extracted Page 772
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-772
Sanskrit Original
न दैवं पैतृकं कार्य तीर्थस्नानं द्विजार्चनम् । दानं गुरुजने मानं ज्ञानं परहितं शुभम्॥१२॥ मनसा न कृतं तेन क्रियया च कथं पुनः कृतं साहसिकं स्तेयं परदाराभिमर्शनम् ॥१३॥ भूतमिथ्यापवादं च साधुनिंदापरं तथा । एवं शतसहस्रं तु तथा गोहरणं कृतम् ॥१४॥ व्यास उवाच तत्राह धर्मराजस्तु कालानलसमप्रभः । घर्मराज उवाच नयतैन॑ फलं शूरा दुर्गतिं चापुनर्भवम् ॥१५॥ व्यास उवाच एतस्मिन्नंतरे वोचच्चत्रगुप्तोऽ नुकंपकः । चित्रगुप्त उवाच अस्त्यस्य गोशिरः पुण्यं किंचिन्नाथ क्षमाधुना ॥१६॥ व्यास उवाच नृपो द्वादशवार्षिक्यं लभेत्पुण्यादयं क्षितौ । तथाह धर्मराजस्तं गच्छमर्त्य॑ दुरात्मक ॥१७॥ अकंटकं च राज्यं च भुंक्ष्व द्वादशवत्सरम् । यद्धृतं गोशिरो मार्गे मुक्तस्तस्यैव कारणात् ॥१८॥ पुनरत्र समागम्य संगंता चापुनर्भवम् । ततः कृतांजलिर्देवमुवाच दुःखपीडितः ॥१९॥ चोर उवाच धर्मराजानुकंपा च मय्येवं पापकारिणि। कुरु नाथ त्वनाथे च जानामि प्रीतिपूर्वकम्॥२०॥ व्यास उवाच धर्मराजस्तु तं चाह बाढमेव मितो व्रज । स्मरिष्यसि स्ववृत्तांतं मत्प्रसादात्सुदुःखितः॥२९॥ न तो दैवकार्य किया है, न पितृ कार्य किया है, न तो तीर्थ में स्नान किया है और न तो ब्राह्मणों की पूजा की है ॥११॥ इसने मन से भी न तो दान किया है, न तो गुरुजनों का सम्मान किया है । न इसको दूसरों का कल्याण करने वाला ज्ञान ही है । फिर इसके कर्म करने का क्या प्रश्न है ?॥१२॥ इसने साहसिक चोरी की है, दूसरों की पत्नियों को दूषित किया है । जीवों का मिथ्या अपवाद किया है तथा सज्जनों की निन्दा की है ॥१३॥ इसने सैकड़ों हजार जीवों का मिथ्या अपवाद किया है तथा सज्जनों की निन्दा की है ॥१३॥ इसने सैकड़ों हजार गायों को चुराया है ॥१४॥ व्यासजी ने कहा-- इसपर कालाग्नि के समान कान्ति वाले धर्मराज बोले धर्मराज ने कहा-- हे दूतों! इसे ले जाओ ऐसे नरक में डाल दो कि इसका पुनर्जन्म न हो ॥१५॥ व्यासजी ने कहा-- उसी समय दयालु चित्रगुप्त बोले ॥१६॥ चित्रगुप्त ने कहा-- हे नाथ ! क्षमा करे ! इसका गोशिर का पुण्य है । इसका पुनर्भव है ही नहीं और न इसके कल्याण का लेश भी है । अतएव हे देव उस पाप का नाश करने के लिए आप विचार करके बतलायें ।।१७।। व्यासजी ने कहा-- इसके पुण्य का उदय होने पर यह बारह वर्ष तक राजा बने । इसके बाद धर्मराज ने कहा-- पापी तुम मर्त्य लोक में जाओ ॥१८॥ तुमने जो रास्ते में गौ का शिर रख दिया है उसी के कारण बारह वर्षो तक अकण्टक राज्य करो ॥१९॥ फिर यहाँ आकर तुम अपुनर्भवत्व को प्राप्त करोगे । दुःख से पीडित उसने हाथ जोड़कर धर्मराज से कहा ॥२०॥ चोर ने कहा-- मुझ जैसे पापी पर धर्मराज की यह अनुकम्पा है । हे नाथ ! मैं अनाथ हूँ आप प्रेमपूर्वक मेरे पर अनुकम्पा करें ॥२१॥ व्यासजी ने कहा-- धर्मराज ने चोर से
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