Srishti Khanda Extracted Page 771

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-771

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Sanskrit Original

उनसठवो अध्याय व्यास उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि कीर्त्तिधर्मपरं शुभम्। सेतुबंधफलं पुण्यं ब्रह्मणा भाषितं यथा ॥१॥ कांतारे दुस्तरे पंके पुरुषं कुसमाकुलम् । आलिं कृत्वा भवेत्पूतो देवत्वं याति मानवः ॥२॥ वितस्तौ तु लभेत्स्वर्गं दिव्यं वर्षशतं समम्। एवं संख्याविधानेन नरः स्वर्गान्नहीयते ॥३॥ कदाचित्पंकयोगाच्च स्वर्गाद्धुवि विजायते । तदा भट्टारकः श्रीमात्रोगशोकविवर्जितः ॥४॥ पंकादौ संक्रमाश्चैव कृत्वा स्वर्गान्न हीयते । सर्वपापक्षयं तस्य॒ संप्रयाति दिने दिने ॥५॥ तथालिसंक्रमाणां च फलं तुल्यं प्रकीर्तितम्। धनप्राणव्ययेनैव धीमता क्रियते सदा ॥६॥ श्रूयतां यत्पुरावृत्तमाख्यानं वृद्धसंमतम् । कश्चिच्चोरो महाभीष्मो स्तेयकर्मणि चोद्यतः ॥७॥ कांतारे गोशिरः स्थाप्य क्रांतवा स्तेयं गतो हासौ । धनापहरणं कृत्वा गृहस्थस्य च तेन हि ॥८॥ गतः स्वमंदिरं तत्र जनागच्छंति वर्त्मनि । सर्वेषामेकपादस्य सुखं भवति निश्चितम्॥९॥ एकपादे ह्वदे दुर्गे तारकं गोशिरः परम् । चांद्रायणं च तत्तस्य कांतारे संस्थितं शिरः॥१०॥ ततश्चोरस्य निधने चित्रगुप्तप्रणीतके। चित्रगुप्तउवाच धर्मस्य फलमात्रं तु एतस्य च न विद्यते _ ॥१९॥ सेतु बन्धन (पुल बनाने) का फल वर्णन, कीचड़ आदि पार करने के लिए पाषाण आदि से मार्ग बनाने का फल वर्णन, चोर को कथा, अनेक प्रकार के दानों का माहात्म्य, रुद्राक्ष का माहात्म्य, रुद्राक्ष धारण विधि, रुद्राक्ष धारण का माहात्म्य व्यासजी ने कहा-- अब मैं अत्यन्त कल्याणकारी कीर्ति धर्म का वर्णन करता हूँ । सेतुबन्धन का जैसा पुण्य ब्रह्माजी ने बतलाया है उसे मैं बतला रहा हूँ । वन में अथवा जिसको पार करना कठिन हो ऐसे कीचड़ में अत्यधिक काँटों से भरे हुए स्थान में सेतु का निर्माण करके मनुष्य पवित्र हो जाता है और वह देवत्व को प्राप्त कर लेता है ॥२॥ एक वित्ता चौड़ा मार्ग बनाने वाला देवताओं के सौ वर्ष तक स्वर्ग को प्राप्त करता है । इसतरह से अधिकाधिक चौड़ा मार्ग बनाने वाला मनुष्य स्वर्ग से कभी भ्रष्ट नहीं होता है ॥३। जब कभी पाप के कारण वह स्वर्ग से भूमि पर आता है तो वह भट्टारक (विद्वान्) श्रीमान् रोग और शोक से रहित होता है ॥४॥ कीचड़ आदि में रास्ता को बनाकर वह कभी स्वर्ग से भ्रष्ट नहीं होता है । उसके सारे पाप प्रतिदिन विनष्ट होते रहते हैं ॥५॥ इस अलि (सीढी) और पाप करने के रास्ते का फल एक समान होता है । इसलिए बुद्धिमान पुरुष धन तथा शक्ति का व्यय करके अलि और सङ्गम का निर्माण करते हैं ॥६। आपलोग एक वृद्ध सम्मत प्राचीन इतिहास सुनें । कोई अत्यन्त भयङ्कर चोर सदा चोरी करता रहता था ॥७॥ वह वन में गौ का शिर बनाकर उसके द्वारा उसे पार करके चोरी किया। किसी गृहस्थ के घर से धन चुराकर उसी के द्वारा अपने घर चला गया ॥८॥ उसके बाद उसी मार्ग से लोग जाते थे । उसके कारण सभी लोगों को सुख मिलता था ॥९॥ एक पैर के दुर्गम सरोवर को गोशिर से आसानी से पार किया जा सकता था । कान्तार (वन) में विद्यमान वह शिर उसके लिए चान्द्रायण हो गया ॥१०॥ उस चोर के मर जाने पर चित्रगुप्त प्रणीत पञ्जिका में देखकर चित्रगुप्त ने कहा-- इसका कोई भी धर्म का फल नहीं है । इसने

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