Srishti Khanda Extracted Page 770

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-770

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Sanskrit Original

ij | सृष्टिखण्ड ७४५ मर्त्यलोके यथाभोग्यं पुन:स्वर्गे पुनर्भुवि । पुनरेव तदाभ्यासात् खातमारामकं पुनः ॥४४॥ बथापुण्यादिकं कृत्वा स्वर्गमर्त्याधिप: पुमान्। अशक्तस्तु प्रपां कृत्वा पुष्करिण्याः फलं लभेत्॥४५॥ प्रपाया लक्षणं चात्र सर्वपापहरं परम् । सर्वभोगप्रदं शुद्धं स्वर्गापवर्गदं स्थिरम् ॥४६॥ लक्षणं च प्रवक्ष्यामि प्रपाया: कीर्तिवर्धनम् । निर्जले$ ध्वनि पृक्तेच स्थानेकृत्वा च मंडपम्॥४७॥ बहुपान्थे समायाते ग्रीष्मवर्षाशरत्स्वपि । अगरुकादिसौगंध्यं जलं पूगं सचंद्रकम् ॥४८॥ आसन चैव तांबूलं दत्वा स्वर्गान्न हीयते । एवं वर्षत्रयेणैव पुष्करिण्याः फलं लभेत् ॥४९॥ ् वर्गाच्चैवाच्युतो मर्त्यो देवैरपि प्रपूज्यते। मासमेकं तु योदद्यात्मपां ग्रीष्मेथ निर्जले ॥५०॥ कल्पैकं तु वसेत्स्वर्गे स्वर्गादभ्रष्टो महीयते । प्रपादास्तत्रतिष्ठंति यत्र पुष्करिणीप्रदाः ॥५१॥ नोचेद्धर्मघटो देयः पुण्यपापक्षयाय च । एषधर्मघटो ज्ञेयो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥५२॥ तव प्रसादात्सफलाः मम संतु मनोरथाः । स्वर्णमाघं चतुर्भागं दक्षिणार्थथटस्य च ॥५३॥ एवं वर्षत्रयेणैव प्रपादानफलं लभेत् । यःपठेच्छावयेद्वापि पुष्करिण्यादिजं फलम् ॥५४॥ साक्षात्पापात् भवेन्मुक्तस्तत्प्रसादात्तुसद्रतिः । जनेषु श्रावयेद्यस्तु पुण्याख्यानमिदं शुभम् ॥५५॥ कल्पकोटिसहस्राणि सुरलोके स तिष्ठति ॥५६॥ इति श्रीपद्ममहापुरणे प्रथमे सृष्टिखंडे पुष्करिण्यादिधर्मकीर्तनं नामाष्टपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५८॥ ie के ही समान स्वर्ग लोक में भी वे भोग्य होते है । उसी अभ्यास के कारण वह पुरुष भूलोक में आकर जलाशय और उद्यान इत्यादि को बनाते हैं ॥४४।॥ जिस तरह के पुण्य आदि को करके मनुष्य स्वर्गलोक तथा मर्त्यलोक का स्वामी होता है, वैसा पुण्य करता है । असमर्थ व्यक्ति प्याऊ का ही दान करके पुष्करिणी के दान का फल प्राप्त कर लेता है ॥४५॥ प्रपा का फल इस लोक में सभी पापों को विनष्ट करने वाला, सभी भोगों को प्रदान करने वाला, शुद्ध तथा स्थिर स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाला होता है ॥४६॥ कीर्ति को बढाने वाले प्रपा (प्याऊ) का लक्षण मैं बतलाता हूँ । निर्जन मार्ग में एकान्त स्थान में मण्डप बनाकर, जहाँ पर अनेक पथिक आते हों वहाँ पर ग्रीष्म, वर्षा या शरद ऋतुओं में भी, अगरु आदि की सुगन्धि से सुगन्धित चन्दन मिश्रित जल, सुपारी ॥४८॥ आसन तथा ताम्बूल देने वाला मनुष्य कभी भी स्वर्ग से नहीं गिरता है । इसतरह से तीन वर्षां तक करने से उसे पुष्करिणी दान का फल प्राप्त होता है ॥४९॥ वह पुरुष स्वर्ग में सदा रहता है तथा देवता उसकी पुजा करते हैं । जो पुरुष निर्जल स्थान में ग्रीष्म ऋतु में एक मास तक जल पिलाता है ॥५०॥ वह एक कल्प तक स्वर्ग में निवास करता है, वहाँ से ष्ट होने पर भूलोक में पूजित होता है । प्याऊ चलाने वाले उसी लोक में जाते हैं, जहाँ पुष्करिणी दान करने वाले जाते हँ ॥५१॥ यदि यह सम्भव हो तो पापों का नाश करने के लिए पवित्र धर्मघट का दान करना चाहिए । यह धर्मघट ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव स्वरूप होता है । धर्मघट में दक्षिणा के रूप में चार मासा सोना रखकर दान करके प्रार्थना करना चाहिए हे धर्मघट तुम्हारी कृपा से मेरे मनोरथ सफल हों ॥५२-५३॥ इसतरह से तीन वर्ष तक धर्मघट का दान करने से प्रपादान का फल प्राप्त होता है । जो मनुष्य पुष्करिणी के दान से होने वाले फल को पढता अथवा किसी को सुनाता है ॥५४॥ वह पापों से मुक्त हो जाता है और उसकी कृपा से सद्रति को प्राप्त करता है । जो मनुष्य इस पवित्र आख्यान को लोगों के बीच सुनाता है, वह हजारों करोड़ कल्पों तक देवलोक में निवास करता है ॥५५-५६॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पुष्करिणी आदि के दान से होने वाले धर्म का वर्णन नामक अठावनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५८।। ie

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