Srishti Khanda Extracted Page 769

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-769

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Sanskrit Original

डी श्रीपद्ममहापुराण तथैव चंपकेर्केच त्रयाणां रोपणेपि च। अष्टौ बिल्वस्यवृक्षाश्च न्यग्रोधाश्चैव सप्त च ॥२९॥ निंबस्य दशवृक्षाश्च फलं चैषां समं भवेत्। एकैकस्य फलं चोक्तं वृक्षाणां रोपणे द्विजाः॥३०॥ एवं बुध्वा तु धर्मात्मा यः कुर्यात्कृत्रिमं वनम् । कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च॥३९॥ नाकमेति स चूतस्य समारोप्य सहस्रकम्। ततो द्वित्रिगुणेनैव न्यूने वा प्रचुरेपि वा ॥३२॥ भुंक्ते भुक्त्वा पुनः कुर्याज्नपो वाथ सदीश्वरः। स्वर्ग भोग्यं ततो राज्यं कल्याणं मंगल शुभम् ॥३३॥ आरोग्यं शौर्यसंपन्नमारामादेव जायते । फलानि यस्य खादंति जंतवोथ सहस्त्रशः ॥३४॥ आश्रिता विहगाः कीटाः पतगाः शलभादयः। छायाश्रिताश्च ये सत्वास्तत्संख्याताः प्रथग्जनाः ॥३५॥ तस्य किंकरतां यांति शतशो देवतार्चिताः । ये च वृक्षा महासत्वास्सर्वे ते देवरूपिणः ॥३६। तदर्चापितृवत्कार्या शुश्रूषां जलपिंडकम् । मर्त्यलोके च ते पुत्रास्तस्य जन्मनि जन्मनि ॥३७॥ सुरूपाः सुविनीताश्च सदा पुण्यक्रियाशुभाः । एवं गणेशतां यांति जंतवश्चूतलग्नकाः॥३८॥ धात्री हरीतकी चान्ये कटुतिक्ताम्लसंभवाः । सर्वे चारामतः शुद्धाः फलदाः शिवदाः सदा॥३९॥ प्रासादा यत्र सौवर्णाः सर्वरत्मविभूषिताः । सर्वाभरणसंयुक्ता विमानाश्चानिलोपमाः ॥४०॥ शातकुंभमयावृक्षाः सदैव सर्वदायिनः । सर्वतुसुखदाः सौम्यकन्यका अप्सरस्समाः ॥४९॥ गीतऱृत्यपरा धीरास्तत्र तिष्ठंति वृक्षदाः । पुष्करिण्यो विशेषेण खातान्यन्यानि यानि च ॥४२॥ शुद्धोपलांतरच्िता नद्यः पायसकर्दमाः । पुनर्दुग्धसफेनाश्च अन्नादिषड्सान्विताः ॥४ ३॥ रौरव नरक में निवास करते हैं । अश्वत्थ के एक वृक्ष को रोपने का जो फल होता है ॥२८।॥ उसी तरह का फल तीन चम्पा का या तीन मन्दार को रोपने का फल होता है । आठ विल्ववृक्षों तथा सात बट वृक्षों के भी लगाने का वहीं फल होता है ॥२९॥ निम्ब के दश वृक्ष लगाने का भी वैसा ही फल होता है । हे द्विजों एक-एक वृक्षों के रोपने का फल अभी तक मैंने बतलाया ॥३०॥ इन सारी बातों को जानकर जो कृत्रिम वन का निर्माण करता है वह ग्यारह सौ करोड कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है । आम का वन लगाकर हजार करोड़ कल्पों तक स्वर्ग में रहता है । उसके बाद दो गुना या तीन गुना अथवा उससे भी अधिक स्वर्ग को भोगता है ॥३२॥ उसके बाद वह राजा अथवा ईश्वर होता है । वह स्वर्गी भोग्य पदार्थों को भोगता है, उसके बाद वह कल्याण को प्राप्त करता है ॥३३॥ उस उद्यान से ही अरोग्य तथा शौर्य सम्पन्नता होती है । जिस वृक्ष के फलों को हजारों जीव खाते हैं ॥३४॥ उस उद्यान में पक्षी, कीड़े, पतंग, शलभ आदि छाया प्राप्त करते है, उनकी जितनी संख्या होती है, उतने ही लोग उसके किङ्कर (नौकर) होते हैं ॥३५॥ वह पुरुष सैकड़ों देवताओं से अर्चित होता है । जो बड़े वृक्ष हैं वे सबके सब देवता स्वरूप होते हैं ॥३६॥ उनकी पूजा माता-पिता के समान करना चाहिए । उनकी सुश्रुषा पितरों के लिए किए जाने वाले तर्पण और श्राद्ध के समान है । वे मर्त्यलोक में उस पुरुष को अनेक जन्मो में पुत्र के रूप में प्राप्त होते हैं ॥३७॥ वे सुन्दर रूप वाले, विनीत तथा मङ्गलमय पुण्यकार्यो को करने वाले पुत्र होते हैं । इसीतरह आम के वृक्ष में लगने वाले जीव गणेश होते हैं ॥३८॥ आँवला, हरे, तथा दूसरे कटु तिक्त और खट्टे फल वाले सभी वृक्ष आराम (उद्यान) में शुद्ध फल देने वाले तथा कल्याणप्रद होते हैं ॥३९॥ जहाँ पर सुवर्णमय प्रासाद सभी रत्नों से अलंकृत, सभी आभूषणों से सुशोभित तथा वायु के समान विमान होते हैं ॥४०॥ सुवर्ण के समान तथा सदैव सबकुछ प्रदान करने वाले वे वृक्ष होते हैं तथा सभी ऋतुओं में सुख देने वाले होते हैं जहाँ कन्याएँ सौम्य स्वभाव वाली तथा अप्सराओं के समान सुन्दर ॥४१॥ गीत तथा नृत्य परायण धैर्य युक्त स्वभाव वाली होती हैं, वहीं पर ये वृक्ष दान करने वाले पुरुष जाते हैं । विशेष रूप से वहाँ पुष्करिणियाँ तथा दूसरे जलाशय भी ॥४२॥ शुद्ध पत्थरों से बनी होती हैं, दूध की नदियाँ होती हैं, उनका फेन भी दुग्ध के ही समान होता हे । अन्न आदि षड़सों से युक्त होते हैं ॥४३॥ मर्त्यलोक

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