Srishti Khanda Extracted Page 767
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-767
Sanskrit Original
अठावनवाँ अध्याय व्यास उवाच शाखिनामेव सर्वेषां फलं वक्ष्यामि यादृशम्। तच्छृणुध्वं महाभागा रोपणे च पृथक् पृथक् ॥१॥ यस्तु रोपयते तीरे पुण्यवृक्षान्समंततः। तस्य पुण्यफलं ज्ञातुं कथितुं नैव शक्यते ॥२॥ अन्यत्र रोपणं कृत्वा शाखिनां यत्फलं लभेत् । ततो जलसमीपे तु लक्षकोटिगुणं भवेत् ॥३॥ स्वयं पुष्करिणी तीरे त्वनंतं फलमश्नुते । तस्माच्छतगुणं ब्रूमः शाखिनां पुण्यकारिणाम् ॥४॥ अश्वत्थरोपणं कृत्वा जलाशयसमीपतः । यत्फलं लभते मरत्यों न तत्क्रतुशतैरपि ॥५॥ पतंति यानि पत्राणि जले पर्वणि पर्वणि । तानि पिंडसमानीह पितृणामक्षयं ययुः ॥६॥ खादंति पतगास्तत्र फलानि कामतो ध्रुवम् । ब्रह्मभक्ष्यसमं तस्य पुण्यं भवति चाक्षयम् ॥७॥ अश्वत्थेनैव भक्ष्येण रोपणेनैव यत्फलम्। तठे क्रतुशतैनैंव पुत्ररैव शतैरपि ॥८॥ उष्णे च्छायां प्रगृह्णति गावो देवद्विजातयः । कर्तुः पितृगणानां च स्वर्गो भवति चाक्षयः ॥९॥ कर्तु स्वस्थस्य वै विघ्नमक्षयत्वान्न शक्यते । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन रोपयेद् वृक्षमाधवम् ॥१०॥ एकं वृक्षं समारोप्य नरः स्वर्गान्न हीयते । तस्मादेव महावृक्षं रोपयध्वं द्विजोत्तमाः ॥९९॥ जलानां निकटे रम्ये रसानां क्रयविक्रये । मार्गे जलाशये वृक्षान् रोपयेद्योमहाशयः॥९२॥ अश्वत्थादीन्समारोप्य स्वर्ग याति मनोरमम्। अर्चयित्वा तु यत्पुण्यं प्रवक्ष्यामि द्विजातयः ॥९३॥ अश्वत्थ आदि वृक्षों को रोपने की विधि तथा फल का वर्णन, प्याऊ दान की विधि, और घर्मघट दान विधि का वर्णन व्यासजी ने कहा-- सभी वृक्षों के लगाने का जैसा फल होता है, उसे मैं बतलाता हूँ । उन वृक्षों को रोपने का फल आपलोग सुनें ॥१॥ जो व्यक्ति जलाशय के तट पर वृक्षों को चारो ओर लगाता है, उससे होने वाले पुण्य फल को न तो जाना जा सकता है और न कहा जा सकता है ॥२॥ जलाशय तट से भिन्न स्थान पर वृक्षों के रोपने से जो फल होता है उससे लाख गुना अधिक जल के समीप वृक्षों को लगाने का फल होता है ॥३॥ पुष्करिणी के तीर पर वृक्ष लगाने का अनन्त फल होता है, उसकी अपेक्षा पवित्र वृक्षों के लगाने का सौ गुना फल होता है ॥४॥ जो जलाशय के सन्निकट अश्वत्थ (पीपल) का वृक्ष लगाता है, उसका उसको सैकड़ों यज्ञों के फल से अधिक फल प्राप्त होता है ॥५॥ प्रत्येक पर्वों पर पीपल के जो पत्ते पानी में गिरते हैं, उनका फल पितरों को पिण्डदान करने के समान होता है उससे पितरों को अक्षय तृप्ति होती है ॥६॥ पक्षीगण उसके फलों को अपनी इच्छा के अनुसार खाते हैं, उसका भी फल ब्राह्मण भोजन कराने के समान अक्षय होता है ॥७॥ अश्वत्थ रूपी भक्ष्य वृक्ष के रोपने से जो फल होता है, वह सैकड़ों यज्ञों तथा पुत्रों से भी नहीं प्राप्त होता है ॥८॥ गर्मी के दिनों में अश्वत्थ वृक्ष की छाया देवता, ब्राह्मण और गौ प्राप्त करते हैं उससे रोपने वाले के पितरों को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।।९। अश्वत्य वृक्ष रोपने वाले के स्वर्ग में किसी प्रकार का विघ्न इसलिए नहीं हो सकता है कि वह स्वर्ग अक्षय होता है । इसीलिए प्रयास पूर्वक अश्वत्थ वृक्ष को रोपना चाहिए ॥१०॥ अश्वत्थ के एक वृक्ष को लगाने से मनुष्य कभी स्वर्ग से गिरता नहीं है, अतएव हे विप्रों आपलोग महावृक्ष को लगायें ॥११॥ जो उदार पुरुष मनोहर जल के निकट, रसों के क्रय- विक्रय के स्थान पर मार्ग में पड़ने वाले जलाशय पर वृक्षों को लगाता है, वह अश्वत्थ आदि वृक्षों को रोपकर स्वर्ग DN
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