Srishti Khanda Extracted Page 766

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-766

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Sanskrit Original

a सृष्टिखण्ड ७४१ साक्षिणामग्रतस्तेन प्रस्तरः पातितस्तथा । पुष्करिण्यां महत्यां च दृष्टं नरसुरासुरैः ॥३५॥ ततोधर्मतुलायां तु तुलितं धर्मसाक्षिणा । दीनारायुतदानस्य पुष्करिण्या जलस्य तु॥३६॥ न समं तु दिनैकं तु जलस्य धर्मतो भृशम् । धनिनो मानसं दुःखं मोघार्थ च परेऽहनि॥३७॥ शिलोच्चयोऽ भवत्तीर्णो द्वीपवच्च जलोपरि । ततः कोलाहलः शब्दो जनानां समुपस्थितः ॥३८॥ तच्छुत्वाद्धुतवाक्यं च मुदा तौ च गतौ ततः। दृष्ट्वा शैलं तथा भूतं कृतं तेनायुतं तथा॥३९॥ ततःखाताधिपेनैव शैलं दूरेनिपातितम् । पुण्यं खातस्य चोत्खाते प्रलुप्तस्य सुतेन हि ॥४०॥ सोपि नाकं समारुहा जन्मजन्मसु निर्वृतः। गोत्रमातृगणानां च नृपाणां सुहृदां तथा॥४१॥ सखीनां चोपकर्तूणां खातं खात्वाऽ क्षयं फलम् । तपस्विनामनाथानां ब्राह्मणानां विशेषतः ॥४२॥ खातं तु जनयित्वा तु स्वर्ग चाक्षयमश्नुते । तस्मात्खातादिकं विप्राः शक्तितो यः करिष्यति।४ ३॥ सर्वपापक्षयात्पुण्यं मोक्षं यायान्नसंशयः । य इदं श्रावयेल्लोके धर्माख्यानं महोत्कटम् ॥४४॥ सर्वखातप्रदानस्य फलमश्राति धार्मिकः । ग्रहणे भास्करस्यैव भागीरथ्यां तटे वरे॥४५॥ गवां कोटिप्रदानस्य फलं श्रुत्वा लभेन्नरः । न च दरिद्रतामेति न शोकं व्याधिसंचयम् ॥४६॥ असंमानं महद्दः खमु भयोर्नाधिगच्छति । इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे खातादिकीर्तनं नाम सप्तपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५७॥ te आपका हो जायेगा । यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह पुष्करिणी मेरी हो जायेगी । बहुत अच्छा कहकर निर्माता धन लेकर अपने घर चला गया ॥३४॥ साक्षी पुरुषों के समक्ष उस धनी ने जलाशय में पत्थर को डाल दिया इसबात को देवताओं और असुरों ने भी देखा ॥३५॥ उसके बाद धर्म साक्षी ने धर्म की तुला पर दश हजार दीनारों तथा उस जलाशय के पुण्य को तौला ॥३६॥ तो एक दिन के भी पुण्य के बारबार वह दीनार नहीं हुआ । उस धनी के मन में कष्ट हुआ कि मेरे दश हजार दीनार व्यर्थ ही चले गये ॥३७॥ दूसरे दिन वह पत्थर जल के ऊपर द्वीप के समान तैरने लगा । उस समय सभी लोग यह देखकर चिल्लाने लगे ॥३८॥ उन लोगों की बातों को सुनकर निर्माता और धनी दोनों प्रसन्नता पूर्वक वहाँ आयें । उस तैरते हुए पत्थर को देखकर धनी ने अपनी स्वर्ण मुद्राओं को उसे दे दिया॥३९॥ उसके बाद सरोवर के स्वामी ने उस पत्थर को सरोवर से निकलवाकर दूर फेंकवा दिया । उस खात के निर्माण का पुण्य भी उस धनिसुत को ही मिला ॥४०॥ वह भी अनेक जन्मों तक स्वर्ग को प्राप्त करके सुखानुभव किया, जलाशय बनाने वाले के गोत्रीय, माताएँ, राजा, मित्रगण ॥४१।। मित्रों तथा उपकारक पुरुषों को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । विशेष रूप से तपस्वियों, अनाथों तथा ब्राह्मणों को अक्षय फल प्राप्त होता है ॥४२॥ जलाशय बनाने वाले इन सबों को अक्षय स्वर्ग मिलता है । अतएव हे विप्रों जो जलाशय निर्माण करायेगा ॥४३॥ वह सभी पापों के विनष्ट हो जाने से मोक्ष प्राप्त करेगा इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है । जो व्यक्ति अत्यन्त पुण्यमय इस कथा को लोगों को सुनाता है ॥४४॥ वह धार्मिक सभी प्रकार के जलाशयों के निर्माण का फल प्राप्त करता है। सुर्य ग्रहण के समय गङ्गाजी के तट पर इस कथा का जो श्रवण करता है, वह सौ गायों का दान देने का फल प्राप्त करता है । वह शोक, दारिद्र्य तथा रोगों से मुक्त हो जाता है !।४५-४६॥ उन दोनों (श्रोता तथा श्रावयिता) को असम्मान जन्य दुःख नहीं होता है । इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के जलाशयादि वर्णन नामक सत्तावनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५७।। +>ओ फल

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