Srishti Khanda Extracted Page 765
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-765
Sanskrit Original
उपदेष्टा च कर्ता च पडेतेस्वर्गगामिन: । दिव्यं च पक्षिणां चैव शतं स्वर्गविनिर्दिशेत् ॥२१॥ क्रोडोवर्षसहस्त्रं तु महिष्ययुतहायनम्। देवरूपं समास्थाय करिण्या लक्षमुच्यते ॥२२॥ कोट्येकमुपदेष्टुश्च कर्तुरक्षयमेव च । पुरा धनिसुतेनैव कृतः ख्यातोजलाशयः ॥२३॥ अयुतधनव्ययेनैव प्राणेनैव बलेन च । सर्वसत्वोपकाराय शिवश्रद्धायुतेन च ॥२४॥ कालेन कियता चापि क्षीणवित्तो भवत् किल। कश्चिदर्थी धनी तस्य मूल्यदानाय चोद्यतः॥२५॥ विमृश्य धनिना चोक्तं व्याहारं श्ृणुताधुना । दीनारस्यायुतं वा ते दास्याम्यस्याश्चकारणात् ॥२६॥ लब्धं ते पुष्करिण्याश्च पुण्यं लाभात्प्रमन्यसे । शक्त्या दत्वाथ मूल्यं तां स्वीयां कर्तुव्यवस्थितः॥२७॥ एवमुक्ते स तं प्राह वासरेप्ययुतं पुनः। फलं भवति वै नित्यं पुण्यं पुण्यविदोविदुः॥२८॥ एतस्मिन्निर्जले देशे शिवं खातं कृतं च मे। स्नानपानादिकं कर्म सर्वे कुर्वत्यभीष्टतः ॥२९॥ तस्मान्मेप्ययुतार्थस्य नैत्यकं फलमिष्यते । ततस्तस्याभवद् हास्यं तथैव च सभासदाम् ॥३०॥ हिया च पीडितः सोपि वाक्यमेतदुवाच ह। सत्यमेतद्दचोस्माकं परीक्षा कुरु धर्मतः ॥३१॥ मत्सरात्सतु तं प्राह शृणु मे वचनं पितः । दीनारायुतमेतत्ते दत्वा चानीय प्रस्तरम्॥३२॥ पातयिष्यामि ते खाते यथायोगं प्रमज्जतु। उन्मज्जति च यत्काले प्रस्तरः संतरत्यपि ॥३३॥ क्षयं यास्यति नोवित्तं नोचेन्मे धर्मतोहि सा। बाढमुक्त्वायुतं तस्य गृहीत्वा स्वगृहं गतः॥३४॥ हें ॥१९॥ अपने माता-पिता का त्याग करके भोग्य धन के क्षीण हो जाने पर उसका भोग वैसे ही होता है जैसे पक्षी, सूकर, महिषी तथा करिणी उपभोग करते हैं ॥२०॥ जलाशय बनाने का उपदेश करने वाले तथा जलाशय बनाने वाले स्वर्गगामी होते है यदि उस जलाशय में पक्षिगण पानी पीते हैं तो दिव्य सौ वर्ष तक उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है । सूकरों के उसका उपभोग करने पर दिव्य हजार वर्षो का स्वर्ग प्राप्त होता है, भैंसो द्वारा उसका उपभोग किए जाने पर दशहजार दिव्य वर्षों तक स्वर्ग प्राप्त होता है । हथिनियों द्वारा उसका उपभोग किए जाने पर दाता देवता होकर लाख दिव्य वर्षा तक स्वर्ग में निवास करता है ॥२१-२२॥ जलाशय निर्माण का उपदेश करने वाले को एक करोड़ दिव्य वर्षों तक स्वर्ग की प्राप्ति होती है, और जलाशय का निर्माण करने वाले को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । पूर्वकाल में धनिसुत नामक व्यक्ति ने प्रख्यात जलाशय का निर्माण कराया ॥२३॥ वह दश हजार मुद्रा, लगाकर प्राणपन से अपनी सम्पूर्ण शक्ति द्वारा उसका निर्माण कराया । वह श्रद्धा पूर्वक सम्पूर्ण जीवों का उपकार करने के लिए उसे बनवाया था ॥२४॥ कुछ समय के बाद उसकी सम्पत्ति समाप्त हो गयी । कोई धनी व्यक्ति उस जलाशय का मूल्य देकर उसे खरीदना चाहा ॥२५॥ विचार करके धनी ने कहा इसके विषय में आपलोग व्यवहार सुनें । मैं आपको इसके लिए दश हजार स्वर्ण मुद्रायें दूँगा ॥२६॥ आपने तो पुष्करिणी बनाने का पुण्य लाभ प्राप्त ही कर लिया है । अपनी शक्ति के अनुसार धन देकर उसने उस पुष्करिणी को अपना बनाना चाहा।२७॥ उसके ऐसा कहने पर निर्माता नेकहा कि दश हजार का पुण्य तो मुझे प्रतिदिन प्राप्त होता है, इस बात को पुण्यों के वेत्ता पुरुष जानते हैं ॥२८॥ मैंने इस निर्जल प्रदेश में कल्याणकारी जलाशय बनवाया है । सभी लोग अपने अपनी इच्छा के अनुसार इसमें स्नान करते हैं और जल पोते हैं ॥२९॥ उसके कारण मुझे प्रतिदिन दश हजार का पुण्य मिलता है । उसको सुनकर सभी सभासद उसका उपहास किए ॥३०॥ लज्जा से दु:खी होकर निर्माता ने कहा मेरी यह वाणी सत्य है, आपलोग धर्मानुसार इसकी परीक्षा कर लें ॥३१॥ मत्सर के कारण उस धनी ने कहा आप मेरी बात सुनें । मैं आपको दश हजार दीनार दे देता हूँ । उसके बाद पत्थर लाकर ॥३२॥ इसमें डालता हूँ । वह पत्थर स्वाभाविक रूप से डूब जायेगा । उसके बाद वह ऊपर आकर तैरने लगे तो ॥३३॥ मेरा वह धन भी
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know