Srishti Khanda Extracted Page 764

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-764

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Sanskrit Original

तोयैरन्नादिपाकैश्च प्रसन्नो मानवो भवेत् । प्राणानां च विनान्नैश्च धारणन्नैव जायते ॥६॥ पितृणां तर्पणं शौचं रूपं वैगंध्य नाशनम् । बीजं त्विहार्जितं सर्व सर्व तोये प्रतिष्ठितम्॥७॥ वस्त्रस्य धावनं रुच्य भाजनानां तथैव च । तेनैव सर्वकार्यं च पानीयं मेध्यमेव च ॥८॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वापीकूपतटाककम्। कारयेच्च बलैः सर्वैस्तथा सर्वधनेन च ॥९॥ ततो विनिर्जले देशे यो ददाति जलाशयम्। वासरे वासरे तस्य कल्पं स्वर्गविनिर्दिशेत्॥१०॥ ् रिविष्टपाच्च्युतो विप्रो वेदशास्तरार्थ पारगः । लोकबंधुः सधर्मात्मा तपस्तप्त्वादिवं ब्रजेत् ॥१९॥ एवं जन्माष्टकं प्राप्य एकस्याक्षयमिष्यते। क्षत्रियाणां कुले जातः सार्वभौमो भवेज्नप: ॥९२॥ विशोऽक्षयं धनं विद्या जन्मज्जन्मसु यत्तप्रियम्। शूद्रादयोन्त्यजाश्चान्ये लभंते स्वर्गतिं मुहुः ॥९३॥ चतुर्हस्तप्रमाणं तु कूपं खनति यः पुमान् । परोपकारकं नित्यं कल्पं स्वर्ग तु हायने ॥१४॥ द्विगुणे द्विगुणं विद्याच्छतं चैव चतुर्गुणे । विंशत्किष्कुप्रमाणां तु दद्यात्पुष्करिणी तु यः ॥१५॥ विष्णोर्धाम लभेत्सोपि दिव्यभोगं तथैव च । अनंतरं नृपो जातो धनीवागीश्वरो भवेत् ॥१६॥ एवं दविस्त्रश्चतुर्वापि गुणतो भोग्यमिष्यते । विस्तीर्णे प्रचुरं विद्धि सहस्रेणाच्युतो दिवः ॥९७॥ सहस्रादिद्दगुणेनैव सुरपूज्यो भवेन्नरः । जन्तवस्तत्र ये संति यावंतो जीवनं ययुः ॥१८॥ तत्संख्याका जनास्तस्य किंकराः पृष्ठलग्नकाः। भवंति सततं गेहे पुरे जनपदेषु च ॥१९॥ विहाय पितरं भोग्या धने क्षीणे यथा वनम्। पक्षिणस्सूकरश्चैव महिषीकरिणी तथा ॥२०॥ वर्ष पर्यन्त वह निभींकता पूर्वक स्वर्ग का भोग प्राप्त करता है ॥५॥ जल से ही अन्न इत्यादि पकते हैं और मनुष्य प्रसन्न होते हैं अन्न के बिना कोई जीवित नहीं रह सकता है ॥६॥ पितरों का तर्पण, पावित्र्य, रूप तथा दुर्गन्धि का नाश, इस संसार में अजित सभी बीज सबके सब जल से ही सम्भव हैं ॥७॥ वस्रों को धोना, पात्रों को अच्छी तरह से चमकाना चूकि जल से ही सम्भव है अतएव जल पवित्र है ॥८॥ अतएव हर तरह का प्रयास करके बावली, कूप, तडाग का निर्माण कराना चाहिए तथा सम्पूर्ण बल एवं धन लगाकर इन सबों का निर्माण करना चाहिए ॥९॥ जल रहित स्थान में जो जलाशय का दान करता है, उसको प्रत्येक दिन एक-एक कल्प तक का स्वर्ग प्राप्त होता है॥१०॥ स्वर्ग से गिरा हुआ ब्राह्मण वेद एवं शास्र में पारंगत होता है । वह लोकबन्धु, धर्मात्मा होता है तथा तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त करता है ॥११॥ इसतरह से आठ जन्म उसे प्राप्त होते है । एक-एक जन्म उसका अक्षय होता है। जो क्षत्रिय होता है, वह सार्वभौम राजा होता है ॥१२॥ स्वर्ग से गिरा हुआ वैश्य प्रत्येक जन्मों में अक्षय धन, विद्या तथा अपनी सारी प्रिय वस्तुओं को प्राप्त करता है । शूद्र आदि जो अन्त्यज होते हैं वे बार-बार स्वर्ग को प्राप्त करते हैं ॥१३॥ जो मनुष्य चार हाथ कुँआ नित्य ही परोपकार की दृष्टि से खनता है । ऐसा एक वर्ष तक करने वाला एक कल्प तक स्वर्ग का भोग भोगता है ॥१४॥ उसके दो गुना अर्थात् प्रतिदिन आठ हाथ कूप खनने पर उसके दो गुना अर्थात् दो कल्प तक स्वर्ग में निवास होता है और चार गुना प्रतिदिन खनने पर सौ गुना फल होता है । जो व्यक्ति बीस हाथ की पुष्करिणी का दान देता है ॥१५॥ वह भी भगवान् विष्णु के धाम में जाता है और दिव्य भोगों को प्राप्त करता है । उसके बाद वह राजा होता है फिर धनी और वागीश्वर होता है ॥१६॥ इसतरह दो तीन अथवा चार गुना वह भोगों को प्राप्त करता है । अत्यन्त विस्तृत पुष्करिणी दान करने पर वह भगवान् विष्णु के लोक में हजारगुना भोगों को प्राप्त करता है ॥१७॥ दो हजार गुना विस्तृत जलाशय दान से मनुष्य देवताओं का पूज्य हो जाता है। उस जलाशय में जितने जीव जीते हैं ॥१८॥ उतने ही लोग उसके अनुचर उसके गृह, ग्राम तथा जनपदों में होते

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