Srishti Khanda Extracted Page 763

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-763

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Sanskrit Original

श्रीपडामहापुराण यःपठेच्छृणुयाद्वापि तस्यनास्तीह दुर्गतिः । ब्रह्महत्यादिभिः पापैर्नलिप्येत कदाचन ॥४२॥ गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नर:। तत्फलं समवाप्रोति पंचाख्यानावगाहनात् ॥४३॥ स्नानेन पुष्करे नित्यं भागीरथ्यां च सर्वदा । यत्फलंतदवाप्रोति सकृच्छ्वणगोचरात् ॥४४॥ दुःस्वप्रं नाशयेत्क्षिप्रं तथारोग्यं प्रयच्छति । लक्ष्म्यारोग्यकरं चैव तस्माच्छरोतव्यमेव हि ॥४५॥ इति श्रीपद्ममहापुरणे प्रथमे सृष्टिखंडे पंचाख्यानं नाम षट्पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥ ie सत्तावनवाँ अध्याय द्विज उवाच कीर्तिधर्मोथलोकेषु सर्वाणि प्रवराणि च । वद नो मुनिशार्दूल यदि नोस्ति त्वनुग्रहः ॥१॥ व्यास उवाच यस्य खाते वने गावस्तृप्यांति मासमेव च । यद्वासप्तदिनात्पूतः सर्वदेवैः स पूजितः ॥२॥ पुष्करिण्या विशेषेण पूताया यज्ञकर्मणा । यत्फलं जलदानेन सर्वमत्रास्य तच्छृणु ॥३॥ हायने हायने चैव कल्पं कल्पं विधीयते । दानात्स्वर्गमवाप्रोति तोयदः सर्वदो भुवि॥४॥ मेघे वर्षति खाते च जायंते ये तुशीकराः । तावद्वर्षसहस्राणि दिवमश्नाति मानवः ॥५॥ सुनाया । जो इसको पढता अथवा सुनता है उसकी दुर्गति नहीं होती है । वह ब्रह्महत्या आदि पापों से कभी संलिप्त नहीं होता है ।॥।४१-४२॥ करोड़ों गायों का दान करने से मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति हाती है, उस फल की प्राप्ति इस पञ्चाख्यान का अध्ययन करने से ही हो जाती है ॥४३॥ पुष्कर में तथा गड़ाजी में नित्य स्नान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति इस आख्यान को एक बार सुन लेने से हो जाती है ॥४४॥ उससे शीघ्र ही दुःस्वप्न का नाश हो जाता हे और आरोग्य की प्राप्ति होती है । लक्ष्मी प्रदान करने वाला तथा अरोग्य प्रदान करने वाला होने के कारण इसे सुनना ही चाहिए ॥४५।। इस तरह श्रीपद्महापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पञ्चारख्यान नामक छप्पनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५६।। Me: जलाशयदान का माहात्म्य, धनिक सुत की कथा ब्राह्मणों ने कहा-- हे मुनिश्रेष्ठ व्यासजी ! आपकी यदि हम लोगों पर कृपा है तो हमलोगों को यश, धर्म तथा संसार की श्रेष्ठ वस्तुओं को प्रदान करने वाली कथा को सुनायें ॥१॥ व्यासजी ने कहा-- जिसके जलाशय में, वन में गयें जल पीकर एक मास तक तृप्त होती हैं, अथवा सात दिनों तक तृप्त होती हें, वह व्यक्ति पवित्र होकर सभी देवताओं द्वारा पूजित होता है ॥२॥ विशेष रूप से वे पुष्करिणी जो यज्ञ के द्वारा पवित्र हो गयी हैं । उसके जल का दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसे पूर्णरूप से सुनें ॥३॥ प्रतिवर्ष पृथिवी पर जलदान करने वाले को उतने कल्प का स्वर्ग मिलता है ॥४॥ मेघ के बरसने पर उस खात में जितने जल के विन्दु होते हैं, उतने हजार

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