Srishti Khanda Extracted Page 762
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-762
Sanskrit Original
व्यास उवाच एतस्मिन्नंतरे देवाः सिद्धाश्वपरमर्षय: ॥२९॥ प्रचककः पुष्पवर्षाणि साधुसाध्वित्यनादयन् । देवदुंदुभयो े दुर्विमानेषु वनेषु च॥३०॥ समारूह्य रथं स्वं स्वं हरिवीथीपुरं ययुः । तदद्भुतं समालोक्य विप्रोऽ वोचज्जनार्दनम्॥३९॥ उपदेशं च देवेश ब्रहि मे मधुसूदन । श्रीभगवानुवाच गच्छ स्वपितरौ तात शोकविक्लवमानसौ ॥३२॥ समाराध्य प्रयत्मेन मद्गृहं प्राप्स्यसेऽ चिरात् । पितृमातृसमा देवा नतिष्ठंति सुरालये ॥३३॥ याभ्यां सुगर्हितं देहं शिशुत्वे पालितं सदा। आज्ञानदोषसहितं प्रपुष्टं चापि वर्धितम् ॥३४॥ याभ्यां तयोस्समं नास्ति त्रैलोक्ये सचराचरे। ततो देवगणास्सर्वे पंचभिस्तै मुदान्विताः ॥३५॥ माधवं संस्तुबंतश्च गतास्तेहरिमंदिरम् । खचितां च पुरीं रम्यां विश्वकर्मविनिर्मिताम् ॥३६॥ रत्माछ्याष्टिसंपूर्णा कल्पवृक्षादिभिर्युताम्। शातकुम्भमयैगेहै स्सर्वरत्ैस्सकर्बुराम् ॥३७॥ बञ्रवैडूर्यसोपानां स्वर्णदीतोयसंयुताम्। गीतवाद्यदिसंपूर्णा सर्वदुर्गसमाकुलाम् ॥३८॥ कोकिलालापबहुलां सिद्धगंधर्वसेविताम्। रूपाढ्यैः सुजनैः पूर्णां प्रयांतीमिव खेपुरीम् ॥३९॥ ततः स्थित्वा च्युताः सर्वे सर्वलोकोर्ध्वतो भृशम् । द्विजोपि पितरौ गत्वा समाराध्य प्रयत्मतः ॥४०॥ अचिरेणैव कालेन सकुटुंबोहरिं ययौ। पंचाख्यानमिदं पुण्यं मया ते समुदाहृतम् ॥४१॥ के घर के सन्निकट रहने वाले लोग तथा घर की छिपकली आदि भी ॥२८॥ अनेक प्रकार के जो कीट पतङ्ग थे वे उन सबों के पीछे देवता हो गये । व्यसजी ने कहा-- उस समय देवता, सिद्धगण और परमर्षिगण ॥२९॥ सबके सब साधु-साधु कहते हुए फूलों की वर्षा किए । देवताओं ने विमानों में तथा वनों में दुन्दुभियों को बजाया ॥३०॥ वे सब के सब अपने-अपने रथ पर बैठकर श्रीहरि के लोक में चले गये । उस अद्भुत कार्य को देखकर ब्राह्मण ने भगवान् जनार्दन से कहा ॥३१॥ हे भगवन् ! मुझे अपने कर्तव्य का आप उपदेश दें । श्रीभगवान् ने कहा-- हे तात ! तुम अपने माता-पिता के पास जाओ, उनका मन शोक से व्याकुल है ॥३२॥ उन दोनों की आराधना करके तुम शीघ्र ही मेरे लोक में आओगे । पिता और माता के समान देवलोक में भी कोई देवता नहीं है ॥३३॥ उन दोनों ने अपने पुत्र के निन्दित शरीर का बचपन में पालन किया है । आज्ञान तथा दोष युक्त भी उस शरीर को पुष्ट किया है और बढाया है ॥३४॥ अत एव दोनों के समान पूज्य इस चराचर जगत् में कोई भी नहीं है । उसके बाद सभी देवता उन पाँचों के साथ प्रसन्नता पूर्वक ॥३५॥ श्रीभगवान् की स्तुति करते हुए श्रीहरि के लोक में चले गये । वह सुन्दर पुरी रत्न जटित तथा विश्वकर्मा निर्मित थी ॥३६॥ रत्नों से भरी हुयी तथा अभिप्रेत वस्तुओं से भरी हुयी वह पुरी कल्पवृक्ष आदि से युक्त थी । उसके गृह सुवर्ण निर्मित तथा सभी रत्नों से जटित थे ॥३७॥ उसकी सीढियाँ हीरों तथा वैडूर्यं मणि से निर्मित थी तथा गङ्गा नदी के जल से परिपूर्ण थी । उसमें सदा गीत और वाद्य हो रहे थे सभी प्रकार के दुर्गो से वह घिरी थी ॥३८। कोकिलाएँ बोल रही थीं तथा इस नगरी में सिद्ध तथा गन्धर्व रहते थे । वह रूपवान् सज्जनों से पूर्ण थी मानो वह आकाश में जा रही हो ॥३९॥ उसके बाद सबके सब अपने विमानों से सभी लोकों से अत्यधिक ऊपर उतरे । ब्राह्मण भी अपने माता-पिता के पास जाकर प्रयत्न पूर्वक उनकी आराधना करके॥४०॥ थोड़े ही दिन में अपने परिवार के साथ श्रीहरि के लोक में चले गये । मैने यह पवित्र पञ्चाख्यान तुमको
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