Srishti Khanda Extracted Page 760

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-760

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड छ३५ छप्पनवो अध्याय श्रीभगवानुवाच पुरा शर्वः स्ब्रियो दृष्ट्वा युवतीरूपशालिनीः। गंधर्वकिन्नराणां च मनुष्याणां च सर्वतः ॥९॥ मंत्रेण ताः समाकृष्य त्वतिदूरे विहायसि। तपो व्याजपरो देवस्तासु संगतमानसः ॥२॥ अतिरम्यां कुटीं कृत्वा ताभिः सह महेश्वरः । क्रीडां चकार सहसा मनोभवपराभवः॥३॥ एतस्मिन्नंतरे गौर्याश्चित्तमुद्भ्रततां गतम्। अपश्यद्धयानयोगेन क्रीडंतं जगदीश्वरम्॥४॥ सतरीभिरंतर्गतं ज्ञात्वा रोषस्य वशगाऽभवत्। ततः क्षेमंकरी रूपा भूत्वा च प्रविवेश सा ॥५॥ व्योमैकांतेतिदूरे च कामदेवसमप्रभम् । वामातिमध्यगंशुभ्रं पुरुषं पुरुषोत्तमम्॥६॥ स्रीभिःसह समालिंग्य प्रक्रीडंतं मुहुर्मुहुः । चुंम्बन्तं निर्भरं देवं हरं रागप्रपीडितम् ॥७॥ वृत्तं क्षेमंकरी दृष्ट्वा निपपाताग्रतस्तदा । तासां केशेषु चाकृष्य चकार चरणाहतिम् ॥८॥ त्रपया पीडितश्शर्वः पराङ्मुखमवस्थितः। केशेष्वाकृष्य रोषात्ताः पातयामास भूतले ॥९॥ खियः सर्वा धरां प्राप्य सहसाविकृताननाः । उमाशापप्रदग्धांगाम्लेच्छानां वशमागताः ॥९०॥ ताश्चांडालस्त्रियः ख्याता अधवाधवसंयुताः । अद्याप्युमाकृतं शापं सर्वास्ताश्च समश्नुयुः ॥९९॥ अथोमाशतधारूपं कृत्वेशं संगता तदा । एवंप्रभावं जानीहि कामस्य सततं द्विज ॥१२॥ तर्ताश्चरात्तयासार्द्ध॑ गतः कैलासमंदिरम् । अतःक्षेमंकरीं दृष्ट्वा येऽभिनन्दन्ति मानवाः ॥९३॥ तेषांवित्तद्धि विभवा भवंतीह परत्र च । कुंकुमारक्तसर्वागि कुदेन्दुधवलानने ॥९४॥ गन्धर्वो आदि की स्त्रियों के साथ शिवजी की क्रीडा का वर्णन, क्षेमङ्कारी की कथा, पञ्चाख्यान की समाप्ति श्रीभगवान् ने कहा-- पहले भगवान् शिव गन्धर्वो, किन्नरों तथा मनुष्यों की सुन्दर तथा युवती खियों को॥ १॥ मन्त्र के द्वारा बहुत दूर आकाश में खींच कर तपस्या के बहाने, उन सबों के साथ रमण करते थे ॥२॥ वहाँ पर अत्यन्त मनोहर कुटी बनाकर उन सबों के साथ महेश्वर कामार्त होकर क्रीडा करते थे । उसी समय गौरी का चित्त उद्भ्रान्त हो गया । उन्होंने ध्यान योग के द्वारा क्रीडा करते हुए जगदीश्वर को देखा ॥४॥ उनको स्त्रियों के साथ भीतर गये हुए जानकर गौरी क्रुद्ध हो गयीं । उसके बाद क्षेमङ्करी का रूप बनाकर उन्होंने भीतर प्रवेश विया आकाश में अत्यन्त दूर एकान्त में कामदेव के समान कान्ति वाले, सुन्दरी स्त्रियों के मध्य में विद्यमान शुभ्र पुरुष पुरुषोत्तम।।६।। को स्त्रियों केसाथ आलिङ्गन करके बार-बार क्रीडा करते हुए और आश्वस्त होकर खूब चुंबन करते हुए, काम परवश शिवजी को देखकर क्षेमङ्करी उनके सामने ही खड़ी हो गयी और उन सबों के केश को पकड़कर उन्हें खींच कर चरणों से मारा ॥७-८॥ लज्जित होकर शिवजी तो पीछे मुख करके खड़े थे । पार्वतीजी ने उन सबों के केश को पकड़कर और खींचकर क्रोध पूर्वक पृथिवी पर पटक दिया ॥९॥ पृथिवी पर गिरते ही उन स्त्रियों का मुख विकृत हो गया । उमा के शाप के कारण वे म्लेच्छों की वशवर्तिनी हो गयीं ॥१०॥ वे सब चाण्डालों की स्त्रियाँ पतिहीन थी और पतियों से संयुक्त हो गयीं, आज भी पार्वती के शाप को वे सब भोगती हैं ॥११॥ इसके बाद उमा ने सैकड़ो क्षेमङ्करियों का रूप बनाकर शङ्करजी के साथ क्रीडा किया, हे द्विज ! तुम काम के प्रभाव को इसतरह का जानो।। ११। उसके बाद शङ्करजी पार्वतीजी के साथ कैलास पर्वत पर आये । अतएव क्षेमंकरी को देखकर जो मनुष्य उसका अभिवादन करते हैं ॥१३॥ उन सबों के इस लोक में तथा परलोक में ऐश्वर्य की वृद्धि होती है । क्षेमङ्करी को

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